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सुशासन से साइबर सुरक्षा तक, एनबीएफसी क्षेत्र की टिकाऊ वृद्धि के लिए आरबीआई ने बताए पांच अहम मंत्र

 

नई दिल्ली, 26 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू ने कहा है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) अब केवल वैकल्पिक ऋणदाता की भूमिका में नहीं रह गई हैं, बल्कि वे विशेषीकृत वित्तीय साझेदार के रूप में उभर रही हैं। ऐसे में क्षेत्र की दीर्घकालिक और टिकाऊ वृद्धि के लिए पांच प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

आरबीआई के सितंबर बुलेटिन में मुर्मू ने कहा कि देश में एनबीएफसी क्षेत्र लगातार विस्तार कर रहा है। वर्तमान में एनबीएफसी ऋण सकल नॉमिनल जीडीपी का 16.7 प्रतिशत हो चुका है, जो एक वर्ष पहले 15.9 प्रतिशत था। वहीं अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए गए कुल ऋण में एनबीएफसी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई है, जो पहले 26 प्रतिशत थी।

मुर्मू ने सबसे पहले सुशासन (गुड गवर्नेंस) को प्राथमिकता बताते हुए कहा कि किसी भी मजबूत संस्थान की नींव बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था होती है। उन्होंने कहा कि निदेशक मंडल और शीर्ष प्रबंधन को पूरे संगठन में अनुपालन और नैतिक मूल्यों की मजबूत संस्कृति विकसित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे एनबीएफसी क्षेत्र का आकार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उसके प्रशासनिक और संस्थागत ढांचे को भी मजबूत होना चाहिए।

दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उन्होंने लिक्विडिटी प्रबंधन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अतीत में कई बार देखा गया है कि एनबीएफसी और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां (एचएफसी) बाजार की धारणा में बदलाव और सीमित फंडिंग स्रोतों के कारण दबाव में आ सकती हैं। इसलिए मजबूत लिक्विडिटी प्रबंधन अनिवार्य है। उन्होंने कंपनियों को फंडिंग स्रोतों में विविधता लाने की सलाह दी और कहा कि एक गहरा और तरल कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार इस दिशा में मददगार साबित होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि सिक्योरिटाइजेशन को केवल लिक्विडिटी जुटाने के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे जोखिम हस्तांतरण और पूंजी मुक्त करने के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसके लिए पारदर्शिता और उचित नियामकीय मानकों का पालन जरूरी है।

तीसरे क्षेत्र के रूप में मुर्मू ने संपत्ति गुणवत्ता और जोखिम प्रबंधन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे ऋण वृद्धि की रफ्तार बढ़ती है, वैसे-वैसे खराब ऋण (एनपीए) और परिसंपत्ति गुणवत्ता से जुड़े जोखिम भी बढ़ सकते हैं। इसलिए संस्थानों को नियमित स्ट्रेस टेस्टिंग, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और गतिशील प्रावधान व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों का उपयोग उधारकर्ताओं में वित्तीय तनाव के शुरुआती संकेतों की पहचान के लिए अधिक व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विकास की दौड़ में ऋण मंजूरी के मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

चौथे क्षेत्र के रूप में उन्होंने ग्राहकों के विश्वास को सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति बताया। उन्होंने कहा कि वित्तीय नवाचार की गति कभी भी उपभोक्ता संरक्षण से आगे नहीं निकलनी चाहिए, खासकर कमजोर और संवेदनशील ग्राहकों के मामले में।

मुर्मू ने कहा कि आचरण-आधारित विनियमन, शिकायत निवारण व्यवस्था और जिम्मेदार ऋण वितरण आरबीआई की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल हैं। उन्होंने हाल ही में जारी रिकवरी एजेंटों के आचरण संबंधी दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में सार्वजनिक विश्वास का कोई विकल्प नहीं है।

पांचवें और अंतिम प्रमुख क्षेत्र के रूप में उन्होंने डिजिटल परिवर्तन और साइबर सुरक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन फाइनेंस में ब्लॉकचेन और धोखाधड़ी की पहचान में एआई जैसी तकनीकों का इस्तेमाल लगातार बढ़ना चाहिए। हालांकि तकनीकी विस्तार के साथ साइबर जोखिम भी बढ़ते हैं।

उन्होंने कहा कि ग्राहक डेटा की सुरक्षा और संस्थानों पर भरोसा बनाए रखने के लिए साइबर सुरक्षा में निवेश सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके अनुसार, तकनीकी नवाचार का उद्देश्य केवल दक्षता बढ़ाना नहीं, बल्कि निष्पक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।

--आईएएनएस

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