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25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाना इतिहास के साथ न्याय : नितिन नवीन

 

नई दिल्ली, 25 जून (आईएएनएस)। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने गुरुवार को कहा कि दशकों तक आपातकाल के काले अध्याय को देश की सामूहिक स्मृति से मिटाने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने का फैसला करके इतिहास के साथ न्याय किया गया है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर नितिन नवीन ने लिखा, "यह दिवस आपातकाल के दौरान हुई घटनाओं की याद दिलाता है और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति देश की प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।"

उन्होंने कहा, "12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था। इसके बाद राष्ट्रीय हित के बजाय सत्ता बचाने को प्राथमिकता दी गई। एक व्यक्ति की कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश की आजादी को बंधक बना लिया गया और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा स्थापित संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कुचलने की कोशिश की गई।"

नितिन नवीन ने दावा किया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया था।

उन्होंने कहा, "लोकतंत्र के समर्थन में आवाज उठाने वाले बड़ी संख्या में नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सहित हजारों लोकतंत्र सेनानियों को जेल भेज दिया गया।"

उन्होंने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर भारी दबाव डाला गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई, जबरन नसबंदी अभियान चलाए गए, मौलिक अधिकार छीन लिए गए और मीसा जैसे कानूनों के जरिए नागरिक स्वतंत्रताओं को दबाया गया। यह सिर्फ राजनीतिक संकट नहीं था, बल्कि लोकतंत्र पर सीधा हमला था।"

नितिन नवीन ने कहा कि सत्ता को पूरी तरह केंद्रित करने के उद्देश्य से संविधान में कई बदलाव किए गए। सत्ता को निरंकुश बनाने के लिए संविधान में कई संशोधन किए गए। न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश हुई, लेकिन भारत की लोकतांत्रिक भावना को दबाया नहीं जा सका।

उन्होंने आरोप लगाया, "कश्मीर से कन्याकुमारी तक युवाओं और आम नागरिकों ने एकजुट होकर इस तानाशाही के खिलाफ संघर्ष किया और लोकतंत्र की बहाली का रास्ता तैयार किया।"

उन्होंने कहा, "संघर्ष के उस दौर में युवा प्रचारक नरेंद्र मोदी गिरफ्तारी से बचते हुए भेष बदलकर आंदोलन का संदेश घर-घर पहुंचा रहे थे। राष्ट्रीय हित और लोकतंत्र की रक्षा को सर्वोपरि रखते हुए भारतीय जनसंघ ने अपने संगठन का जनता पार्टी में विलय कर दिया था।"

उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की भी सराहना की।

उन्होंने कहा, "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए काम किया, जबकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने छात्र शक्ति को संगठित कर जनजागरण अभियान चलाया। त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति की यह भावना भारतीय राजनीति का स्वर्णिम अध्याय है।"

नितिन नवीन ने कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि आपातकाल लगाने वाली पार्टी आज खुद को लोकतंत्र की सबसे बड़ी रक्षक बताने की कोशिश कर रही है। आज देश एक अजीब विडंबना देख रहा है। जिन्होंने लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला किया, वही आज खुद को उसका सबसे बड़ा रक्षक बताने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि चुनावी नतीजे अनुकूल न आने पर वह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठाता है। जब जनता चुनाव में उन्हें नकार देती है तो उनका चुनाव आयोग पर भरोसा खत्म हो जाता है और ईवीएम पर सवाल उठाए जाते हैं। जब अदालतों के फैसले उनके राजनीतिक हितों के अनुरूप नहीं होते तो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए जाते हैं। कांग्रेस की राजनीति अब जवाबदेही के बजाय दोषारोपण की राजनीति बन गई है।

उन्होंने आगे कहा, "अगर संसद नहीं चलती तो सरकार को दोष दिया जाता है, चुनाव हार जाएं तो व्यवस्था को दोष दिया जाता है और जनता समर्थन न दे तो संस्थाओं को जिम्मेदार ठहराया जाता है।"

कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, "सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज संविधान की बात करने वाली पार्टी ने आपातकाल के लिए देश से बिना शर्त माफी क्यों नहीं मांगी? अगर संविधान की सच में चिंता होती तो सबसे पहले लोकतंत्र की हत्या जैसे उस अपराध के लिए देश से क्षमा मांगनी चाहिए थी।"

उन्होंने कहा, "दशकों तक लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष और संविधान पर हुए इस हमले को इतिहास के हाशिये पर रखा गया।"

उन्होंने केंद्र सरकार के 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने के फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लेकर इतिहास के साथ न्याय किया गया है। यह दिवस हमें अतीत की याद दिलाने के साथ-साथ संविधान, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए हमेशा सतर्क और समर्पित रहने का संकल्प भी मजबूत करता है।"

--आईएएनएस

एएमटी/एबीएम