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भारत से नेपाल चाहता है 'बड़ी मदद', पीएम बालेन शाह के प्रस्तावित दौरे से पहले मिले संकेत

 

काठमांडू, 17 अक्टूबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की प्रस्तावित भारत यात्रा से पहले नेपाल 'बड़े सहायता पैकेज' प्राप्त करने की उम्मीद रखता है। काठमांडू स्थित विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसका संकेत दिया है। उनके अनुसार, नवंबर के आखिरी दिनों में संभव इस यात्रा के दौरान नेपाल सहायता पैकेज की मांग रख सकता है।

नेपाल और भारत की ओर से अभी तक इस यात्रा को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि, नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि शाह 22 या 23 नवंबर को नई दिल्ली की यात्रा कर सकते हैं।

प्रधानमंत्री की प्रेस सलाहकार दीपा दहल ने आईएएनएस को बताया, "नवंबर के आखिरी दिनों में पीएम शाह के भारत दौरे की संभावना है। वह भारत में कितने दिन रहेंगे, यह अभी तय नहीं हुआ है।"

विदेश मंत्रालय ने अभी तक भारतीय पक्ष को इस यात्रा के लिए कोई निश्चित तारीख नहीं सुझाई है।

5 मार्च को हुए संसदीय चुनावों के बाद, 27 मार्च को शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, जिसके बाद भारत ने उन्हें नई दिल्ली आने का निमंत्रण दिया था। अब तक शाह केवल एक बार विदेश यात्रा पर गए हैं। सितंबर में वो संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क गए थे।

उनका यह प्रस्तावित नई दिल्ली दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब नेपाल 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के संकट से जूझ रहा है। 'नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी' के अनुसार, इस बाढ़ में लगभग 1,500 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 5,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।

भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में आई बाढ़ ने कई बस्तियों, जलविद्युत संयंत्रों, सड़कों और पुलों को बहा दिया, जिससे अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है और अब पुनर्निर्माण के लिए भारी धनराशि की आवश्यकता है।

वहीं, विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, "हालांकि पुनर्निर्माण के लिए बहुत बड़े संसाधनों की जरूरत है, लेकिन देश में बाढ़ आने से पहले ही हम भारत से बड़े पैमाने पर सहायता पैकेज की मांग कर रहे थे।" हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि नेपाल कितनी राशि की मांग कर रहा है।

अधिकारी ने कहा कि नेपाल सरकार ऐसी सहायता चाहती है जिसमें शर्तें कम हों, ताकि काम आसानी से हो सके और कम समय में ही इसके स्पष्ट परिणाम दिखाई दें।

भारत, अपने बजट आवंटन के जरिए नेपाल को नियमित अनुदान तो देता ही है, इसके अलावा भारत की 'लाइन ऑफ क्रेडिट' (ऋण सुविधा) से भी नेपाल काफी संसाधनों का उपयोग करता रहा है। उदाहरण के लिए, 2015 के भूकंप के बाद पुनर्निर्माण कार्यों के लिए भारत ने 1 अरब अमेरिकी डॉलर देने का वादा किया था। भारतीय दूतावास की वेबसाइट के अनुसार, नेपाल में अभी चार 'लाइन ऑफ क्रेडिट' (एलओसी) का इस्तेमाल हो रहा है। इनकी राशि क्रमशः 100 मिलियन, 250 मिलियन, 550 मिलियन और 750 मिलियन अमेरिकी डॉलर है, जो कुल मिलाकर 1.65 बिलियन अमेरिकी डॉलर बनती है।

इसमें कहा गया है कि ये एलओसी बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं को लेकर नेपाल सरकार की ओर से तय की गई प्राथमिकता के आधार पर मुहैया कराई जाती है।

एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक ऑफ इंडिया (एक्जिम बैंक) के जरिए दिए जाने वाले क्रेडिट के लिए यह शर्त है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले कुछ हिस्से भारत से ही आने चाहिए।

विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि नेपाल न केवल एक बड़ा वित्तीय पैकेज चाहता है, बल्कि वह लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवादों को सुलझाने, और ऊर्जा, व्यापार, पारगमन (ट्रांजिट) तथा हवाई सेवाओं के क्षेत्र में ठोस परिणाम भी चाहता है।

सीमा विवाद, खासकर लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा के इलाकों को लेकर, दोनों देशों के संबंधों में तनाव का कारण बना हुआ है। नेपाल इन इलाकों पर अपना दावा करता है, जबकि ये भारत के उत्तराखंड राज्य का अभिन्न हिस्सा हैं।

नेपाल भारतीय हवाई क्षेत्र से कुछ और 'एयर-एंट्री रूट' (हवाई प्रवेश मार्ग) भी मांग रहा है। अभी नेपाल में आने वाली लगभग 90 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय उड़ानें दक्षिणी नेपाल में सिमारा के ऊपर बने एक ही, बहुत व्यस्त प्रवेश बिंदु से होकर आती हैं।

नेपाल ने पहली बार लगभग एक दशक पहले हवाई मार्गों की मांग की थी। ये मार्ग नेपाल के दो नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों—पश्चिमी नेपाल के पोखरा और दक्षिण-पश्चिम के भैरहवा—के संचालन के लिए बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

नेपाल के पश्चिमी और पूर्वी गलियारों से होकर सीधे, कम ऊंचाई वाले प्रवेश मार्ग देने में भारत हिचकिचाता रहा है। इसके पीछे सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं, क्योंकि वहां संवेदनशील सैन्य ठिकाने (जैसे गोरखपुर एयर बेस) मौजूद हैं। इसके अलावा, हवाई यातायात प्रबंधन (एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट) से जुड़ी जटिलताएं भी एक कारण हैं।

नेपाल ने जनकपुर, भैरहवा और नेपालगंज के जरिए तीन नए प्रवेश बिंदु बनाने का प्रस्ताव दिया है।

अधिकारी के अनुसार, नेपाल 'नेपाल-भारत व्यापार संधि' की जल्द समीक्षा भी चाहता है। यह संधि 2023 में अपने आप रिन्यू (नवीनीकृत) हो गई थी। इस संधि के नियम के अनुसार, हर सात साल में यह अपने आप रिन्यू हो जाती है, जब तक कि कोई एक पक्ष इस पर कोई आपत्ति न जताए।

दोनों पक्षों की आपसी सहमति या 'लेटर्स ऑफ एक्सचेंज' के जरिए, इस संधि की किसी भी धारा, प्रोटोकॉल या प्रावधान में कभी भी बदलाव या संशोधन किया जा सकता है। नेपाल यह भी चाहता है कि भारत उन गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करे, जो इस शर्त के कारण पैदा होती हैं कि नेपाली निर्यातकों को कुछ सामान भारत भेजने के लिए 'ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स' (बीआईएस) से प्रमाण-पत्र लेना पड़ता है।

इस शर्त की वजह से होने वाली प्रक्रियात्मक देरी, सीमेंट, स्टील, प्लाईवुड, जूते-चप्पल, सैनिटरी पैड, डायपर और बिजली के तारों का निर्यात करने वाले नेपाली निर्यातकों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय रही है।

अधिकारियों ने बताया कि इस दौरे के दौरान, दोनों पक्ष भारत की मदद से बनी कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन भी कर सकते हैं। इनमें मध्य कावरेपालानचोक जिले के पनौती इलाके में स्थित 'नेपाल पुलिस अकादमी,' दार्चुला में एक पुल, भैरहवा में 'इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट,' और महाकाली नदी पर बना एक मोटर-योग्य पुल शामिल हैं।

इससे पहले, 'द काठमांडू पोस्ट' ने खबर दी थी कि दोनों प्रधानमंत्रियों के संयुक्त रूप से कुछ परियोजनाओं के निर्माण कार्य की शुरुआत करने की भी उम्मीद है, जिनमें दोधारा चांदनी में 'इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट' और 'लोअर अरुण जलविद्युत परियोजना' शामिल हैं।

--आईएएनएस

केआर/