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'कानूनी व्यवस्था का मजाक बनाया गया', तिहाड़ जेल अधीक्षक के खिलाफ अवमानना कार्यवाही

 

नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। दिल्ली हाईकोर्ट ने तिहाड़ जेल के अधीक्षक के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करते हुए कहा कि अदालत के पैरोल आदेश को लागू न करके कानूनी व्यवस्था का मजाक बनाया गया और एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने तिहाड़ की सेंट्रल जेल-2 के अधीक्षक डॉ. पवन कुमार को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। अदालत ने उन्हें 22 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने और जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

मामला विचाराधीन कैदी अनवर हुसैन की याचिका से जुड़ा है। अनवर ने जेल प्रशासन द्वारा पैरोल आवेदन खारिज किए जाने को चुनौती देते हुए आठ सप्ताह की पैरोल मांगी थी। वह पांच साल पांच महीने से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद है और सुप्रीम कोर्ट में कानूनी उपाय अपनाने के लिए पैरोल चाहता था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 जुलाई को अनवर हुसैन को चार सप्ताह की पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि सक्षम प्राधिकारी आवश्यक शर्तें तय करेगा। हालांकि, अदालत ने पाया कि जेल प्रशासन ने शर्तें तय ही नहीं कीं और रिहाई का आदेश होने के बावजूद याचिकाकर्ता जेल में ही बंद रहा।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जेल प्रशासन की कार्रवाई के कारण एक ऐसा नागरिक, जो पहले ही पांच साल पांच महीने तक विचाराधीन कैदी रहा, अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद सलाखों के पीछे रहने को मजबूर हुआ।

अदालत ने कहा कि जेल प्रशासन द्वारा शर्तें लागू न किए जाने के कारण याचिकाकर्ता को 30 जुलाई के आदेश के पालन के लिए अलग से आवेदन दाखिल करना पड़ा। इसके बाद 11 अगस्त को हाईकोर्ट ने अपने पहले आदेश में संशोधन करते हुए पैरोल पर रिहाई की स्पष्ट शर्तें तय कर दीं।

अदालत के अनुसार, जब याचिकाकर्ता की पत्नी रिहाई की औपचारिकताएं पूरी करने जेल पहुंची, तो उसे बताया गया कि जेल अधिकारी 11 अगस्त का आदेश तब तक लागू नहीं करेंगे, जब तक वह आदेश सीधे हाईकोर्ट से प्राप्त न हो जाए।

इस पर न्यायमूर्ति कौरव ने कहा कि 11 अगस्त का आदेश डिजिटल हस्ताक्षर वाला सार्वजनिक दस्तावेज था, जिसकी प्रामाणिकता आसानी से जांची जा सकती थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की रिहाई रोकने और अदालत के आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए जेल प्रशासन ने बेहद कमजोर और अनुचित कारण दिया।

सुनवाई के दौरान डॉ. पवन कुमार ने कहा कि उनकी कार्रवाई दुर्भावना से प्रेरित नहीं थी। उन्होंने दलील दी कि पैरोल पर रिहाई से पहले याचिकाकर्ता के रहने के पते का सत्यापन नहीं हो पाया था और यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि 30 जुलाई के आदेश में जेल प्रशासन को शर्तें तय करने का अधिकार दिया गया था, फिर भी उसने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया। अदालत ने कहा कि "सामान्य प्रक्रिया" और "रूटीन" जैसे शब्दों का सहारा लेकर जेल अधीक्षक अपने अधिकारों के दुरुपयोग को उचित ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 11 अगस्त के आदेश में याचिकाकर्ता के निवास स्थान से जुड़ी कोई शर्त नहीं थी। अदालत ने कहा कि जेल प्रशासन के कमजोर और अस्वीकार्य बहानों के कारण कानूनी व्यवस्था का मजाक बनाया गया और याचिकाकर्ता के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने डॉ. पवन कुमार के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी। डॉ. कुमार ने अदालत का नोटिस स्वीकार कर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा।

--आईएएनएस

डीएससी