केरल हाई कोर्ट ने सतर्कता जांच के लिए आरटीआई छूट पर स्पष्टता मांगी
कोच्चि, 28 अक्टूबर (आईएएनएस)। केरल उच्च न्यायालय ने बुधवार को राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा कि क्या सरकारी अधिकारियों के खिलाफ सतर्कता जांच (विजिलेंस इंक्वायरी), सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (वीएसीबी) के दो विभागों को मिली छूट के दायरे में आती है।
मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति वी.एम. श्याम कुमार की खंडपीठ ने सरकार को एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें टी1 और टी2 सेक्शन द्वारा संभाली जाने वाली जानकारी की श्रेणियों का विवरण देना होगा, जिन्हें 22 अक्टूबर को जारी एक अधिसूचना के माध्यम से छूट दी गई थी।
अदालत ने गौर किया कि ये दोनों सेक्शन सतर्कता जांच, खुफिया इनपुट, तलाशी रिपोर्ट और सतर्कता कार्यवाही से जुड़ी अन्य जानकारियों को संभालते हैं।
अदालत ने कहा कि इनमें से कुछ जानकारी संवेदनशील हो सकती है, लेकिन इस पर स्पष्टीकरण मांगा कि क्या अधिकारियों के खिलाफ की जाने वाली जांच भी इसके दायरे में आती है।
इस मामले पर तीन सप्ताह बाद फिर से विचार किया जाएगा।
यह जनहित याचिका (पीआईएल) सरकार के उस फैसले को चुनौती देती है, जिसके तहत इन दोनों सेक्शन को छूट के दायरे में लाया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि वीएसीबी मुख्य रूप से एक आपराधिक जांच एजेंसी है, जो लोक सेवकों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करती है। इसे केवल एक प्रशासनिक अधिसूचना के जरिए खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं माना जा सकता।
आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) राज्य सरकारों को यह अधिकार देती है कि वे 'ऑफिशियल गजट' में अधिसूचना जारी करके कुछ विशिष्ट खुफिया और सुरक्षा संगठनों को छूट दे सकती हैं।
याचिकाकर्ता ने बताया कि 7 फरवरी 2006 के सरकारी आदेश के तहत जिन आठ संगठनों को छूट दी गई थी, उनमें वीएसीबी शामिल नहीं था।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि 22 अक्टूबर की अधिसूचना का हवाला देते हुए, वीएसीबी के सूचना अधिकारी अब सतर्कता जांच, प्रारंभिक सत्यापन, क्लोजर रिपोर्ट और अभियोजन की मंजूरी से जुड़ी सूचनाओं के अनुरोधों को खारिज कर रहे हैं।
याचिका में कहा गया है कि आरटीआई अधिनियम में संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा के लिए पहले से ही छूट का प्रावधान है। इसमें ऐसी सामग्री शामिल है, जिसका खुलासा होने पर जांच में बाधा आ सकती है या व्यक्तियों की जान को खतरा हो सकता है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन दोनों सेक्शन को पूरी तरह से छूट देने से राज्य की भ्रष्टाचार-रोधी मशीनरी पर जनता की निगरानी सीमित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने 'स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट बनाम कामता प्रसाद मिश्रा और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसी को धारा 24(4) के तहत अपने आप खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि 2016 में राज्य सरकार ने एक ऐसी ही अधिसूचना को वापस ले लिया था, जब उसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
याचिका में 22 अक्टूबर की अधिसूचना को रद्द करने और इन दोनों सेक्शन पर आरटीआई अधिनियम को लागू रखने की मांग की गई है, ताकि ऐसी जानकारी प्राप्त की जा सके जिसे कानून के तहत छूट नहीं मिली है। हाई कोर्ट ने अभी तक अधिसूचना की वैधता पर कोई फैसला नहीं सुनाया है।
--आईएएनएस
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