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कर्नाटक: आलंद दंगा मामले की वापसी पर भाजपा का राज्यपाल से हस्तक्षेप का आग्रह

 

बेंगलुरु, 2 जून (आईएएनएस)। कर्नाटक में आलंद दंगा मामले से जुड़े आपराधिक मुकदमे वापस लेने के राज्य सरकार के फैसले को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मंगलवार को राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की। भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने विधान परिषद में विपक्ष के नेता चलावडी नारायणस्वामी के नेतृत्व में राज्यपाल थावरचंद गहलोत को ज्ञापन सौंपा।

भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार का यह निर्णय अल्पसंख्यकों को खुश करने और वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित है। प्रतिनिधिमंडल में विधान परिषद में विपक्ष के उपनेता सुनील वाल्यापुरे, एमएलसी शशिल जी. नमोशी, बी.जी. पाटिल, विधायक अविनाश जाधव, पूर्व सांसद डॉ. उमेश जाधव, पूर्व एमएलसी अमरनाथ पाटिल सहित कई भाजपा नेता शामिल थे।

राज्यपाल से मुलाकात के बाद पत्रकारों से बातचीत में चलावडी नारायणस्वामी ने कहा कि कलबुर्गी जिले के आलंद स्थित श्री राघव चैतन्य मंदिर पर हमले के आरोपियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने का निर्णय चौंकाने वाला और निंदनीय है।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटना में ऐतिहासिक श्री राघव चैतन्य शिवलिंग का अपमान, सांप्रदायिक हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और पुलिसकर्मियों पर हमले जैसी गंभीर घटनाएं शामिल थीं। इसके बावजूद, जबकि मामला अदालत में लंबित है, राज्य सरकार ने मुकदमे वापस लेने का फैसला किया है।

नारायणस्वामी ने कहा कि श्री राघव चैतन्य मंदिर और वहां स्थित शिवलिंग का इतिहास 600 वर्ष से अधिक पुराना है। उन्होंने दावा किया कि इस क्षेत्र में पहले भी कई बार सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएं हुई हैं, जिनमें लोगों की जानें गईं, लेकिन सरकार आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय मामलों को वापस ले रही है।

उन्होंने आरोप लगाया कि तलवारों और धारदार हथियारों से लैस हजारों लोगों ने मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं और शिवलिंग के कथित अपमान के बाद परिसर की सफाई कर रहे लोगों पर हमला किया था। मौके पर पहुंची पुलिस टीम पर भी हमला किया गया, वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया और जिला प्रशासन के अधिकारियों को भी निशाना बनाया गया।

भाजपा नेता ने कहा कि सरकार का यह कदम कानून का पालन करने वाले नागरिकों और हिंदू समाज की भावनाओं का अपमान है। उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपियों को दंडित करने के बजाय सरकार उन्हें प्रोत्साहित कर रही है।

उन्होंने सरकार पर आपराधिक मामलों में दोहरा मापदंड अपनाने का भी आरोप लगाया। उनके अनुसार, अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने वाले दलितों, कन्नड़ भाषा के समर्थन में आंदोलन करने वाले कार्यकर्ताओं और कर्नाटक रक्षणा वेदिके के नेता नारायण गौड़ा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाती है, जबकि हिंसा के आरोपियों के मामले वापस लिए जा रहे हैं।

भाजपा ने राज्यपाल से आग्रह किया कि वह राज्य मंत्रिमंडल के इस निर्णय पर पुनर्विचार कराने और इसे निरस्त करवाने के लिए हस्तक्षेप करें।

उल्लेखनीय है कि विवाद का केंद्र बना यह धार्मिक स्थल 14वीं शताब्दी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी, जिन्हें लाडले मशायक के नाम से भी जाना जाता है, और 15वीं शताब्दी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ा हुआ है।

ऐतिहासिक रूप से इस स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग पूजा-अर्चना करते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में पूजा-अधिकार और स्थल की प्रकृति को लेकर विवाद समय-समय पर उभरता रहा है। महाशिवरात्रि के दौरान यह विवाद फिर से सामने आया था।

कथित तौर पर शिवलिंग के अपमान की खबर के बाद हिंदू संगठनों के सदस्य शुद्धिकरण अनुष्ठान करने के लिए वहां पहुंचे थे। इसी दौरान हिंसा भड़क गई और पथराव की घटनाएं हुईं। इस हिंसा में एक केंद्रीय मंत्री, जिला उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक तथा हिंदू संगठनों के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया था। घटना में कई लोग घायल हुए थे।

हिंसा के बाद आलंद पुलिस ने सैकड़ों लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे, जिनमें अंसारी नामक एक व्यक्ति को मुख्य आरोपी बताया गया था। वहीं कांग्रेस नेताओं का कहना था कि कई निर्दोष मुस्लिम युवकों को भी मामले में नामजद किया गया है और उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लिए जाने चाहिए। इसी संबंध में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल बैठक में मामलों की वापसी का निर्णय लिया गया था।

--आईएएनएस

डीएससी