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एफसीआरए बिल: जेपीसी सदस्यों ने 12 अक्टूबर की बैठक टालने और चार सप्ताह का अतिरिक्त समय देने की मांग की

 

नई दिल्ली, 29 सितंबर (आईएएनएस)। फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल (एफसीआरए बिल) पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सदस्यों ने चेयरमैन संजय जायसवाल को पत्र लिखकर 12 अक्टूबर को होने वाली बैठक को टालने का अनुरोध किया है।

29 सितंबर के एक पत्र में कांग्रेस सांसद एंटो एंटनी समेत सदस्यों ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन (संशोधन) अधिनियम (एफसीआरएए) के महत्व और इसके व्यापक असर का हवाला देते हुए बैठक को कम से कम चार हफ्ते के लिए टालने की मांग की।

सदस्यों का कहना है कि बिल की जांच-पड़ताल शुरू करने से पहले उन्हें बिल और उससे जुड़े दस्तावेजों का अच्छी तरह से अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय चाहिए।

उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि स्टेकहोल्डर्स से सार्वजनिक टिप्पणियां, सुझाव और विचार प्राप्त करने की अवधि कम से कम चार सप्ताह तक खुली रखी जाए, ताकि संगठन, विशेषज्ञ और आम जनता अपनी राय दे सकें।

पत्र में कहा गया है कि पर्याप्त समय मिलने से सदस्य बिल पर विचार-विमर्श करने से पहले प्राप्त विचारों पर ठीक से गौर कर सकेंगे। साथ ही इसमें कानून की अधिक व्यापक और जानकारीपूर्ण समीक्षा की मांग की गई।

रिपोर्ट तैयार करने से पहले एफसीआरए कानून के प्रावधानों की विस्तार से समीक्षा करने के लिए भाजपा सांसद जायसवाल की अध्यक्षता में 31 सदस्यों की एक समिति गठित की गई थी।

विदेशी अंशदान (विनियमन) विधेयक, 2006 (एफसीआरए) का उद्देश्य विदेशी अंशदान या विदेशी आतिथ्य (फॉरेन हॉस्पिटैलिटी) की प्राप्ति और उसके उपयोग को विनियमित करने संबंधी कानून को समेकित करना है। साथ ही, राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल किसी भी गतिविधि के लिए ऐसे विदेशी अंशदान या आतिथ्य को प्रतिबंधित करना भी इसका उद्देश्य है।

विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाले सभी संगठन और गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के लिए एफसीआरए के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य है। इनके कार्यों और वित्तीय गतिविधियों की निगरानी गृह मंत्रालय द्वारा की जाती है, जो इस कानून के लिए नोडल प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है।

संशोधन विधेयक को इसी वर्ष 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था। विपक्षी दलों की मांग पर 12 अगस्त को इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेज दिया गया, क्योंकि विपक्ष ने विधेयक के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी।

एफसीआरए विधेयक का जोरदार विरोध कर रहे विपक्षी दलों का आरोप है कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है। उनका कहना है कि इसके कुछ प्रावधान ईसाई एनजीओ तथा अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण और शैक्षणिक संस्थानों के लिए वैध विदेशी फंडिंग को प्रभावित कर सकते हैं।

हालांकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है और कहा है कि ये नियम किसी खास समुदाय को निशाना बनाए बिना विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता के लिए मानक कानूनी प्रक्रियाओं को लागू करते हैं।

सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी धर्म विशेष से जुड़ा नहीं है। इसका मकसद विदेशी योगदान को रेगुलेट करना है ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके और विदेश से मिलने वाले फंड का सही इस्तेमाल सुनिश्चित किया जा सके।

सरकार ने विदेशी योगदान के गलत इस्तेमाल के उदाहरण के तौर पर जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाओं का जिक्र किया है।

--आईएएनएस

एएसएच/वीसी