वैश्विक स्तर पर कीमतों में उछाल से अप्रैल-सितंबर में भारत का प्राकृतिक गैस आयात बिल 23 प्रतिशत बढ़ा
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर (आईएएनएस)। मध्य पूर्व में तनाव के कारण वैश्विक बाजार में ऊर्जा की कीमतों में तेजी आने से चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में भारत का प्राकृतिक गैस आयात बिल 23 प्रतिशत बढ़कर 8.5 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 6.9 अरब डॉलर था। यह जानकारी सरकार के पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) द्वारा संकलित आंकड़ों से मिली है।
हालांकि, आयात बिल में वृद्धि मुख्य रूप से कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई, लेकिन इस छह महीने की अवधि के दौरान तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के आयात की मात्रा में भी 4.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में एलएनजी का आयात बढ़कर 18,189 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर (एमएमएससीएम) हो गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 17,414 एमएमएससीएम था।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली आवाजाही बाधित होने से पड़ोसी खाड़ी क्षेत्र से आयात की खेपों की आपूर्ति प्रभावित हुई। इसके कारण तेल विपणन कंपनियों को अमेरिका से अधिक एलएनजी आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे परिवहन लागत बढ़ गई।
चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन 4.4 प्रतिशत घटकर 16,804 एमएमएससीएम रह गया, जबकि एक साल पहले की समान अवधि में यह 17,585 एमएमएससीएम था। इसका कारण ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल) के पुराने होते गैस क्षेत्रों को बताया गया।
कुल प्राकृतिक गैस की खपत लगभग स्थिर रही। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के 34,773 एमएमएससीएम के मुकाबले 34,769 एमएमएससीएम दर्ज की गई।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-सितंबर अवधि में भारत की प्राकृतिक गैस के लिए आयात पर निर्भरता बढ़कर 52.3 प्रतिशत हो गई, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 50.1 प्रतिशत थी।
सितंबर महीने के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का गैस आयात बिल पिछले साल के इसी महीने की तुलना में लगभग स्थिर रहकर 1.2 अरब डॉलर रहा। हालांकि, इस दौरान आयात की मात्रा 8.5 प्रतिशत घटकर 2,957 एमएमएससीएम रह गई, जो पिछले साल सितंबर में 3,233 एमएमएससीएम थी।
यह स्थिति वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी को दर्शाती है। यमन में हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए हमलों के बाद पश्चिम एशिया संघर्ष और तेज हो गया है, जिससे युद्ध का दायरा लाल सागर क्षेत्र तक फैल गया है। हूती विद्रोहियों ने तटीय क्षेत्र के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है, जिससे समुद्री परिवहन के लिए जोखिम बढ़ गया है। इसके परिणामस्वरूप, होर्मुज स्ट्रेट के बाद लाल सागर क्षेत्र भी समुद्री व्यापार के लिए एक अन्य प्रमुख बाधा क्षेत्र बनकर उभरा है।
--आईएएनएस
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