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यूएनजीए में एआई पर स‍िर्फ कुछ देशों के नियंत्रण का व‍िरोध, हर देश का अपना एआई मॉडल बनाने के पक्ष में भारत का समर्थन

 

संयुक्त राष्ट्र, 27 सितंबर (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र में कई देशों ने इस बात को लेकर चिंता जताई कि एआई जैसी अहम टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण सिर्फ कुछ देशों, सरकारों या बड़ी कंपनियों के हाथों में नहीं रहना चाहिए। भारत ने भी हर देश के अपने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल विकसित करने के अधिकार का समर्थन किया है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कहा कि एआई लोगों को सशक्त बनाने और आर्थिक खुशहाली बढ़ाने में 'बड़ा बदलाव लाने वाली ताकत' बन सकता है।

हालांकि, उन्होंने एआई के गलत इस्तेमाल को लेकर भी चेतावनी दी। जयशंकर ने शनिवार को जनरल डिबेट के दौरान कहा कि एआई का गलत इस्तेमाल पक्षपात को और बढ़ा रहा है और लोगों तथा देशों के बीच आपसी सम्मान को कमजोर कर रहा है।

उन्होंने कहा कि हर देश को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और जरूरतों के मुताबिक अपने एआई मॉडल तैयार करने की आजादी होनी चाहिए।

उनका यह बयान संयुक्त राष्ट्र में एआई को लेकर चल रही एक बड़ी बहस का हिस्सा था। इसमें सवाल उठाए जा रहे हैं कि एआई पर नियंत्रण किसका होगा, इसके नियम कौन तय करेगा और क्या विकासशील देशों को इस टेक्नोलॉजी का भविष्य तय करने में सही मायने में भागीदारी मिलेगी।

मलेशिया ने चेतावनी दी कि ग्लोबल साउथ के देशों को ऐसी जगह बनाकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, जहां सिर्फ डेटा सेंटर और दूसरी टेक्नोलॉजी सुविधाएं लगाई जाएं, जबकि एआई से जुड़े बड़े फैसले और उसका नियंत्रण कहीं और मौजूद सरकारों और कंपनियों के हाथ में रहे।

मलेशिया के विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने कहा, "ग्लोबल साउथ सिर्फ डेटा सेंटर लगाने की जगह नहीं बन सकता, जबकि एआई से जुड़े फैसले कहीं और लिए जाएं।"

उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को सिर्फ एआई के ग्राहक और बाजार बनाकर नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उन्हें नई टेक्नोलॉजी तैयार करने में बराबर का भागीदार बनना चाहिए।

हसन ने कहा कि आज कुछ ही प्राइवेट कंपनियों के पास इस बात पर काफी असर है कि दुनिया के अरबों लोग कैसे बातचीत करते हैं, काम करते हैं, लेनदेन करते हैं और जानकारी हासिल करते हैं। उन्होंने कहा कि एआई के फायदे बहुत बड़े हैं, लेकिन इससे जुड़े खतरे भी उतने ही गंभीर हैं।

मलेशियाई विदेश मंत्री ने डेटा सेंटर और दूसरी टेक्नोलॉजी सुविधाओं के लिए जरूरी पानी, बिजली और जमीन की तरफ भी ध्यान देने को कहा। उनका कहना था कि इसका बोझ विकासशील देशों पर नहीं डाला जाना चाहिए, जबकि इससे होने वाला मुख्य आर्थिक फायदा दूसरे देशों या कंपनियों को मिले।

जर्मनी ने भी एआई के मालिकाना हक के कुछ ही जगहों पर केंद्रित होने को लेकर चिंता जताई। जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने कहा कि दुनिया में एआई से जुड़े ज्यादातर पेटेंट केवल दो बड़े देशों की कंपनियों के पास हैं।

उन्होंने कहा क‍ि जब ताकत वैश्विक हो जाती है, तो जिम्मेदारी भी वैश्विक होनी चाहिए। वाडेफुल ने देशों से सबसे ताकतवर और एडवांस एआई मॉडल के लिए साझा सुरक्षा नियम तय करने की अपील की।

उन्होंने चेतावनी दी कि एआई टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उस रफ्तार से नियम नहीं बना पा रही हैं।

उन्होंने कहा, "एआई हमारे संस्थानों के साथ तालमेल बिठाने का इंतज़ार नहीं कर रहा है। हमारी संस्थाओं को हकीकत के साथ अपनी रफ्तार मिलानी होगी।"

बेलीज के प्रधानमंत्री जॉन ब्रिसेन्यो ने कहा कि अगर एआई के लिए सही नियम बनाए जाएं, तो यह सरकारी सेवाओं को बेहतर बना सकता है और ज्यादा लोगों तक जानकारी पहुंचा सकता है। लेकिन अगर एआई के लिए सही नियम नहीं होंगे, तो यह असमानता बढ़ा सकता है, जरूरी सिस्टम को खतरे में डाल सकता है, लोगों की नौकरियां छीन सकता है और विकासशील देशों को ऐसी टेक्नोलॉजी और नियमों पर निर्भर बना सकता है, जिन्हें कहीं और तैयार किया गया हो।

उन्होंने कहा कि सिर्फ किसी एक देश के अपने कानून ऐसी टेक्नोलॉजी को नियंत्रित करने के लिए काफी नहीं हैं, जो देशों की सीमाओं से परे काम करती है।

सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने एआई को 'सबसे जरूरी नई चुनौती' बताया। उन्होंने विज्ञान, बुनियादी ढांचे और लोगों की स्किल्स में ज्यादा निवेश की मांग की। साथ ही उन्होंने ऐसे सुरक्षा उपाय बनाने पर जोर दिया, जिससे एआई पर इंसानों का नियंत्रण बना रहे।

सऊदी अरब ने एआई से जुड़ी क्षमता बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्रों का नेटवर्क बनाने और रियाद में एआई रिसर्च और एथिक्स सेंटर स्थापित करने के अपने काम का जिक्र किया।

कैमरून ने भी कहा कि नई टेक्नोलॉजी में होने वाली प्रगति का फायदा पूरी मानवता को मिलना चाहिए। उसने नई टेक्नोलॉजी तक पहुंच के मुद्दे को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार की मांग से भी जोड़ा, ताकि विकासशील देशों को आगे बढ़ने के लिए बराबरी का मौका मिल सके।

संयुक्त राष्ट्र ने 2024 में वैश्विक डिजिटल समझौता को अपनाया था। इसका मकसद एआई के मामले में देशों के बीच सहयोग बढ़ाना, डिजिटल दुनिया में मौजूद असमानता को कम करना और सुरक्षित तथा इंसानों को केंद्र में रखने वाली टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना है।

हालांकि, सरकारों के बीच अभी भी इस बात पर बहस जारी है कि इन वैश्विक सिद्धांतों को ऐसे ठोस नियमों में कैसे बदला जाए, जिन्हें वास्तव में लागू कराया जा सके।

--आईएएनएस

एवाई/एएस