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जर्मनी से नेपाल लौटे 13वीं सदी के ऐतिहासिक दस्तावेज, 800 से अधिक सामग्री राष्ट्रीय अभिलेखागार को सौंपी गई

 

काठमांडू, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। नेपाल की राजनीतिक, कानूनी, बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े 800 से अधिक ऐतिहासिक दस्तावेज जर्मनी से नेपाल वापस लाए गए हैं। इनमें कुछ दस्तावेज 13वीं सदी के बताए जा रहे हैं। शुक्रवार को काठमांडू में आयोजित एक समारोह में इन दस्तावेजों को नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार को सौंप दिया गया।

नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, जर्मनी के एक निजी संग्रहालय में रखे इन दस्तावेजों में प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपियां, शाही फरमान, अदालती आदेश, कानूनी दस्तावेज, संस्कृत ग्रंथ और ऐतिहासिक यात्रा विवरण शामिल हैं। औपचारिक रूप से सौंपे जाने से पहले इन्हें जर्मनी से नेपाल वापस लाया गया।

यह संग्रह दिवंगत जोसेफ पीटर रिंडफ्लेश के निजी संग्रह का हिस्सा था। उनके बेटे वाल्टर रिंडफ्लेश ने ये दस्तावेज हीडलबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़े हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज के प्रोफेसर एक्सेल माइकल्स को सौंपे थे। इसके बाद माइकल्स और उनकी टीम के सदस्यों डॉ. माणिक बज्राचार्य और राजन खतीवड़ा ने इन दस्तावेजों को नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल को सौंपा।

माइकल्स और वाल्टर रिंडफ्लेश की दोस्ती ने दस्तावेजों की नेपाल वापसी की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विदेश मंत्रालय के अनुसार, ये दस्तावेज 1780 के दशक से लेकर 1990 के दशक तक अलग-अलग समय में नेपाल से एकत्र किए गए थे।

हस्तांतरण समारोह में विदेश मंत्री खनाल ने कहा कि इन दस्तावेजों की वापसी नेपाल के सांस्कृतिक अधिकारों और उसकी सभ्यतागत विरासत पर संप्रभु स्वामित्व की बहाली का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि नेपाल की कला, साहित्य, परंपराएं और धार्मिक ग्रंथ केवल भौतिक अवशेष नहीं हैं, बल्कि उसकी सभ्यता की जीवंत आत्मा हैं। इनमें सदियों पुराना दार्शनिक चिंतन, राजनीतिक शासन, कानूनी ज्ञान और आध्यात्मिक जीवन संरक्षित है।

खनाल ने दिवंगत रिंडफ्लेश की उस इच्छा को भी याद किया, जिसके तहत उन्होंने अपने निजी संग्रह में मौजूद 800 से अधिक महत्वपूर्ण नेपाली दस्तावेजों को वापस नेपाल भेजने की इच्छा जताई थी। उन्होंने नेपाल की सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनके सम्मान की सराहना की।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस संग्रह में 800 से अधिक शाही और आधिकारिक दस्तावेज हैं। इनमें ताड़पत्र पांडुलिपियां, रुक्का यानी आधिकारिक आदेश और लाल मोहर लगे लाल मोहर यानी शाही फरमान शामिल हैं।

संग्रह को नेपाल वापस भेजे जाने से पहले हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी और हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज ने इसका संरक्षण और सूचीकरण किया।

कैटलॉग के मुताबिक, संग्रह में मल्ल काल की 465 ताड़पत्र पांडुलिपियां शामिल हैं, जिनमें लाल मोहर वाले दस्तावेज भी हैं। इसके अलावा शाह और राणा काल के 312 कानूनी फरमान और शाही दस्तावेज, जिनमें मिट्टी की मुहर वाले दस्तावेज भी शामिल हैं, मौजूद हैं। राणा प्रधानमंत्रियों के कार्यालयों से संबंधित 18 पांडुलिपियां और यात्रा डायरियां तथा विभिन्न विषयों से जुड़ी 11 अन्य पांडुलिपियां भी संग्रह का हिस्सा हैं।

इनमें से कुछ ताड़पत्र पांडुलिपियों को नेपाल में बचे सबसे पुराने दस्तावेजों में शामिल माना जाता है।

विदेश मंत्री खनाल ने दस्तावेजों की पहचान, उनके दस्तावेजीकरण और नेपाल वापसी में प्रोफेसर एक्सेल माइकल्स तथा उनकी शोध टीम की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि उनकी अकादमिक ईमानदारी, शोध और लगातार किए गए प्रयासों से इन ऐतिहासिक सामग्रियों की वापसी संभव हुई।

इन दस्तावेजों की स्वदेश वापसी नेपाल के जर्मनी स्थित दूतावास, हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी, हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज, सराफ फाउंडेशन और नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार के सहयोग से संभव हुई।

खनाल ने यह भी कहा कि नेपाल और जर्मनी दोनों सांस्कृतिक संपत्ति के अवैध आयात, निर्यात और स्वामित्व हस्तांतरण को रोकने और प्रतिबंधित करने के साधनों पर 1970 यूनेस्को कन्वेंशन के पक्षकार हैं। उन्होंने कहा कि दस्तावेजों की वापसी इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के सिद्धांतों के प्रति दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

उन्होंने दस्तावेजों की सुरक्षित वापसी में जर्मन सरकार, काठमांडू स्थित जर्मन दूतावास और हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी के सहयोग की सराहना की।

--आईएएनएस

डीएससी