'सामना' में सीजेपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर केंद्र की आलोचना
मुंबई, 23 अक्टूबर (आईएएनएस)। शिवसेना (यूबीटी) की ओर से शुक्रवार को केंद्र सरकार पर 'गहरी असुरक्षा' से ग्रस्त होने और देश में एक तरह का 'पुलिस राज' कायम करने का आरोप लगाया गया।
शिवसेना (यूबीटी) ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के युवा कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी और सात दिनों तक हिरासत में रखे जाने की कड़ी आलोचना की।
शिवसेना (यूबीटी) की ओर से पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के एक संपादकीय में सवाल उठाया गया कि क्या सरकार शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों से डरती है, या फिर वह तिरंगा थामे युवाओं को देखकर घबरा जाती है?
संपादकीय में मुंबई, दिल्ली, पटना, लखनऊ और कोलकाता जैसे शहरों में सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन की जगहों पर सरकार द्वारा कब्जा करने की निंदा की गई और इसे लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा बताया गया।
'सामना' में एक बड़ा विरोधाभास दिखाते हुए कहा गया है कि जहां अदालतें तिरंगा थामे आदर्शवादी युवाओं को उपदेश देती हैं, वहीं गंभीर अपराध करने वालों के प्रति न्याय व्यवस्था आश्चर्यजनक रूप से नरम रुख अपनाती है। इसमें दुष्कर्म के दोषी पूर्व नेता कुलदीप सेंगर का उदाहरण दिया गया, जिसकी सजा को एक जज ने निलंबित कर दिया था।
'सामना' में प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा गया कि असहमति को दबाने के लिए पुलिस और अपने वफादार समर्थकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें कहा गया कि पहले के नेता विरोध करने वालों का सीधे सामना करते थे, जबकि मौजूदा सरकार बैरिकेड्स, पुलिस बलों और अदालती आदेशों की आड़ में छिप जाती है।
शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र में विस्तार से बताया गया है कि कैसे सीजेपी कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। उन्होंने सरकार के उस आदेश को नहीं माना था, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए अधिकृत जगहों की सूची से एकतरफा तरीके से हटा दिया गया था।
'सामना' में सवाल किया गया, "ये युवा जंतर-मंतर पर 'डांडिया' खेलने नहीं गए थे। वे भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों के खिलाफ अपनी आवाज उठाने गए थे। अगर सरकार सच में उदार और लोकतांत्रिक होती, तो क्या वह जंतर-मंतर को बंद कर देती? सरकार के अन्याय के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सरकार से ही अनुमति मांगना बेतुका है। क्या कोई सरकार कभी अपने ही खिलाफ विरोध प्रदर्शन की अनुमति देगी?"
पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराने के लिए तर्क दिया गया था कि सार्वजनिक रैलियों में 'अवांछित तत्व' घुस सकते हैं। इस तर्क को खारिज करते हुए कहा गया कि सोनम वांगचुक, विपक्षी सांसद और अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर जैसे प्रमुख लोग भी सड़कों पर उतरे हैं।
संपादकीय में सवाल किया गया, "क्या ये लोग भी 'उपद्रवी' हैं?" इसमें आरोप लगाया गया कि असल हिंसा तो सरकार समर्थित उन लोगों की तरफ से होती है, जो खाकी वर्दी पहनकर छात्रों पर कार्रवाई करते हैं।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने हाई कोर्ट द्वारा युवा आदर्शवादियों को फ्रांस या अल्बानिया में हुए छात्र आंदोलनों का उदाहरण देकर नसीहत देने पर गहरी निराशा जताई। पार्टी ने न्यायपालिका से आग्रह किया कि वे केवल ऊपरी लक्षणों को देखने के बजाय समस्या की जड़ तक जाएं।
'सामना' में कहा गया है कि मौजूदा नेतृत्व की नीति बिल्कुल साफ है, नागरिकों को न तो सवाल पूछने चाहिए और न ही जवाबदेही की मांग करनी चाहिए। जब कोई सरकार तिरंगा थामे शांतिप्रिय और देशप्रेमी युवाओं से डरने लगे, तो यह उसकी ताकत नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक वहम की पराकाष्ठा को दिखाता है।
--आईएएनएस
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