'यह मुंबई हमारी है', शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस पर उद्धव गुट ने विरोधियों को दिया संदेश
मुंबई, 19 जून (आईएएनएस)। शिवसेना की स्थापना को आज 60 साल पूरे हो गए हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट ने पार्टी की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर कहा कि पिछले छह दशकों में शिवसेना को तोड़ने और कमजोर करने के कई प्रयास किए गए। पार्टी का दावा है कि विरोधियों के मन में शिवसेना के प्रति भय के कारण समय-समय पर कई समानांतर 'सेनाओं' का गठन हुआ और वे खत्म भी हो गईं, लेकिन बालासाहेब ठाकरे द्वारा रखी गई नींव और स्थापित की गई विचारधारा अडिग रही।
पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में छह सांसदों की हालिया बगावत का नाम लिए बिना कहा गया कि आज भी व्यावसायिक सोच से प्रेरित कई नकली संगठन खड़े किए जा रहे हैं, लेकिन शिवसेना की स्थापना कभी व्यापारिक सौदे के रूप में नहीं हुई। संपादकीय में कहा गया कि शिवसेना प्रमुख ने पार्टी को कभी कारोबार नहीं बनने दिया। इसलिए समय-समय पर अवसरवादी और सौदेबाजी करने वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया, ताकि मराठी अस्मिता और हिंदुत्व की यह धारा शुद्ध बनी रहे, जिसकी गूंज आज भी महाराष्ट्र की घाटियों में सुनाई देती है।
संपादकीय में कहा गया कि शिवसेना ने मराठी समाज को स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया। लोगों में यह आत्मविश्वास जगाया कि वे कह सकें, "यह मुंबई हमारी है।" पार्टी ने आम लोगों को पार्षद बनाया और शाखाओं का ऐसा मजबूत नेटवर्क खड़ा किया, जो जनता के लिए पारिवारिक न्यायालय की तरह काम करता था। सड़क, पानी, स्कूल में प्रवेश, अस्पताल में सहायता और राशन कार्ड जैसी समस्याओं के समाधान के लिए शिवसैनिक दिन-रात लोगों की सेवा में जुटे रहते थे। अन्याय की किसी भी घटना पर सबसे पहले शिवसैनिक ही मौके पर पहुंचते थे।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में महाराष्ट्र के इस गौरव को खत्म करने और राज्य के स्वाभिमान को कमजोर करने की कोशिशें तेज हुई हैं। संपादकीय में कहा गया कि पार्टी की स्थापना के समय से ही राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित लोगों ने समय-समय पर पीठ में छुरा घोंपा। इसके बावजूद शिवसेना हर वार को सहते हुए आज इस मुकाम तक पहुंची है, क्योंकि उसके विरोधियों में कभी सामने से मुकाबला करने का साहस नहीं था। इसमें बालासाहेब ठाकरे के उस कथन का भी उल्लेख किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि "मेरी पीठ पर इतने घाव हो चुके हैं कि अब नए घाव के लिए भी जगह नहीं बची।"
संपादकीय में कहा गया कि शिवसेना ने समाजसेवा की परिभाषा बदल दी। चाहे कोई स्थानीय दुर्घटना हो या बम विस्फोट, शिवसैनिक हमेशा सबसे पहले राहत कार्य में पहुंचते थे। रक्तदान शिविर, शिक्षा अभियान, स्वास्थ्य शिविर और मुफ्त किताब-कॉपी वितरण जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टी हर घर तक पहुंची। निस्वार्थ भाव से काम करते हुए शिवसेना मजदूरों और श्रमिकों का सबसे बड़ा सहारा बनी।
संपादकीय के अनुसार, इसी जनसेवा के दम पर शिवसेना ने नगर निगमों, महाराष्ट्र विधानसभा और संसद तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। पार्टी ने आम नागरिकों को विधायक, सांसद और मंत्री बनाया और महाराष्ट्र के गौरव का प्रतीक बनी।
संपादकीय में कहा गया कि 60वें वर्ष में प्रवेश करते समय पार्टी के मन में एक पीड़ा भी है। एक ओर जहां समर्पित कार्यकर्ताओं की बड़ी सेना हमेशा पार्टी के साथ खड़ी रही, वहीं दूसरी ओर कुछ अवसरवादी, स्वार्थी और दल-बदल करने वाले लोग निजी लाभ के लिए पार्टी छोड़कर चले गए। इसे वर्तमान राजनीति में नैतिकता के पतन का प्रतीक बताया गया।
जिस तरह शिवसेना ने सह्याद्रि की घाटियों में मराठी अस्मिता का संदेश फैलाया, उसी तरह हिंदुत्व का शंखनाद कर पूरे हिंदू समाज को जागृत किया। मलंगगढ़ से लेकर अयोध्या आंदोलन तक हिंदुत्व की लड़ाई में शिवसेना ने बड़े बलिदान दिए। इसमें सवाल उठाया गया कि "क्या आज खुद को हिंदुत्व का सबसे बड़ा समर्थक बताने वाले लोग उस योगदान का एक अंश भी दे पाए हैं?"
संपादकीय के अंत में कहा गया कि जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में कहा जाता है कि यदि वे नहीं होते तो हिंदुओं की पहचान समाप्त हो जाती, उसी विरासत को शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने आगे बढ़ाया और देश की अखंडता की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। नेशन फर्स्ट' (राष्ट्र प्रथम) शिवसेना का स्थायी मंत्र रहा है। यह मंत्र आज भी गूंज रहा है और भविष्य में भी गूंजता रहेगा। शिवसेना अमर है।
आईएएनएस
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