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सर्दी-धुंध के मौसम से पहले दिल्ली अलर्ट, पराली जलाने पर रोक के लिए अभियान जारी

 

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर (आईएएनएस)। उत्तर भारत में धान की कटाई का मौसम शुरू होने के साथ ही दिल्लीवासियों को एक बार फिर से मास्क खरीदने और आने वाली सर्दियों के लिए ऊनी कपड़े निकालने का समय आ गया है। ऐसे में पराली जलाने की वार्षिक घटना पर ध्यान केंद्रित हो रहा है, जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में भीषण शीतकालीन धुंध का एक प्रमुख कारण बन गई है।

हालांकि फसल अवशेष जलाना प्रदूषण का एकमात्र कारण नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों और सरकारी आकलन ने इसे अक्टूबर-नवंबर के आसपास एक महत्वपूर्ण मौसमी कारक के रूप में पहचाना है।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में किसान सितंबर के अंत और अक्टूबर में धान की कटाई करते हैं और उन्हें गेहूं की बुवाई के लिए खेतों को जल्दी तैयार करना होता है। इन दोनों के बीच का अंतराल कम होता है, अक्सर केवल दो से तीन सप्ताह का। इस दौरान कई किसान धान की पराली को खेतों में जलाना एक सस्ता और त्वरित तरीका मानते हैं, लेकिन इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। सरकार के फसल अवशेष प्रबंधन परिचालन दिशानिर्देश 2026 में कहा गया है कि धान के भूसे या फसल अवशेषों का एक बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से पिछली फसल की कटाई के बाद अगली फसल की बुवाई के लिए खेत को साफ करने के लिए जला दिया जाता है, जिससे वातावरण में अभूतपूर्व प्रदूषण की समस्याएं उत्पन्न होती हैं और मिट्टी को भारी मात्रा में पोषक तत्वों का नुकसान होता है और उसकी भौतिक सेहत खराब हो जाती है।

एक टन धान की पराली जलाने से अनुमानित 3 किलोग्राम कण पदार्थ, 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 1,460 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड, 199 किलोग्राम राख, 2 किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक निकलते हैं। ये वायु गुणवत्ता में गिरावट, मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव और मिट्टी के पोषक तत्वों और जैविक पदार्थों की भारी हानि में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच पराली जलाने की घटनाओं में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में उल्लेखनीय कमी आई है। हरियाणा में 53.3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि उत्तर प्रदेश में लगभग 32 प्रतिशत की गिरावट आई। हालांकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं।

2018 से, केंद्र ने फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) योजना लागू की है, जिसका उद्देश्य किसानों को मशीनरी और वैकल्पिक अवशेष प्रबंधन प्रणालियों के साथ सहायता प्रदान करना है। 2018-19 और 2025-26 के बीच, केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत राज्यों को 4,266.47 करोड़ रुपए जारी किए। इसमें पंजाब के लिए 2,056.50 करोड़ रुपए, हरियाणा के लिए 1,171.71 करोड़ रुपए, उत्तर प्रदेश के लिए 868.67 करोड़ रुपए और मध्य प्रदेश के लिए 59 करोड़ रुपए शामिल थे।

चालू वित्तीय वर्ष के लिए भी 592.57 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, जिसमें से 430.87 करोड़ रुपए पहले ही जारी किए जा चुके हैं। हालांकि, आवंटित धनराशि का धीमा उपयोग चिंता का विषय बना हुआ है।

इस बीच, इस अवधि के दौरान 3.23 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें और 41,900 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित किए गए। सीएचसी कृषि मशीनरी को किराए पर उपलब्ध कराने के लिए डिजाइन किए गए हैं ताकि छोटे से छोटे भूमिधारक भी उत्पादक और टिकाऊ खेती के लिए आवश्यक उपकरणों तक पहुंच सकें। इसके अलावा, संशोधित दिशानिर्देशों के तहत भूसे की आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने और बायोमास, बायोफ्यूल और पेलेटाइजेशन उद्योगों के लिए फीडस्टॉक उपलब्ध कराने वाली परियोजनाओं के लिए 65 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता की अनुमति दी गई है। थर्मल पावर प्लांट, संपीड़ित बायोगैस संयंत्र और बायोमास-ऊर्जा परियोजनाओं को दीर्घकालिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि ये कृषि अपशिष्ट को खेतों में जलाने के बजाय ईंधन में परिवर्तित करते हैं।

--आईएएनएस

एमएस/