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शिलांग के पास कैमरा ट्रैप में दिखा दुर्लभ चीनी पैंगोलिन, संरक्षण को मिली नई उम्मीद

 

कोलकाता, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के शोधकर्ताओं को मेघालय की राजधानी शिलांग के निकट लगाए गए कैमरा ट्रैप में गंभीर रूप से संकटग्रस्त चीनी पैंगोलिन की मौजूदगी दर्ज करने में सफलता मिली है। संस्थान के अनुसार, उसके अध्ययन क्षेत्र में इस प्रजाति के दर्ज होने का यह पहला मामला है।

डब्ल्यूआईआई ने कहा, "यह दुर्लभ रिकॉर्ड हमारे जारी प्रोजेक्ट 'मेघालय में स्तनधारी जीवों के समूहों का आकलन' के तहत सामने आया है, जो शिलांग के शहरी क्षेत्र की सीमा से लगे रियात लाबान और लैतकोर आरक्षित वनों पर केंद्रित है।"

शहर के बाहरी हिस्सों में स्थित ये वन क्षेत्र जैव विविधता से बेहद समृद्ध हैं। चीनी पैंगोलिन के अलावा कैमरा ट्रैप में लार्ज इंडियन सिवेट, लेपर्ड कैट, मास्क्ड पाम सिवेट, येलो-थ्रोटेड मार्टेन, इंडियन क्रेस्टेड पोरक्यूपाइन और कालीज तीतर जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियां भी दर्ज की गईं।

शोधकर्ताओं ने कहा कि शहरों के समीप स्थित वन क्षेत्रों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि ये आवास विखंडन और शहरीकरण से प्रभावित वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण शरणस्थली का काम करते हैं।

डब्ल्यूआईआई ने कहा, "चीनी पैंगोलिन जैसी गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति का अनेक मांसाहारी और छोटे स्तनधारी जीवों के साथ इन वनों में पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि ये वन जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका सख्ती से संरक्षण और संरक्षण किया जाना चाहिए।"

चीनी पैंगोलिन भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्सों, दक्षिण-पूर्व एशिया के उत्तरी क्षेत्रों और दक्षिणी चीन में पाया जाता है। वर्ष 2014 से इसे आईयूसीएन रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त (क्रिटिकली एंडेंजर्ड) श्रेणी में रखा गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रजाति के लिए सबसे बड़ा खतरा अवैध शिकार है। पिछले कुछ दशकों में इसके मांस और शल्क (स्केल्स) के लिए लाखों पैंगोलिन मारे गए हैं। इनके शल्कों का उपयोग पारंपरिक चीनी चिकित्सा पद्धति में किया जाता है, हालांकि किसी भी बीमारी के इलाज में इनके प्रभावी होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

एक समय भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में भी चीनी पैंगोलिन की अच्छी-खासी आबादी मौजूद थी, लेकिन शिकार और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में इनके शल्कों की तस्करी के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट आई। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि कानून सख्त होने के बावजूद उनके प्रभावी क्रियान्वयन में चुनौतियां बनी हुई हैं।

एक वन अधिकारी ने बताया कि अक्सर तस्करी में पकड़े जाने वाले लोग केवल कूरियर होते हैं, जबकि अवैध नेटवर्क चलाने वाले सरगना शायद ही कभी कानून के शिकंजे में आते हैं। करोड़ों रुपए के इन नेटवर्कों को वे प्रभावी ढंग से बचाने में सफल रहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि डब्ल्यूआईआई जैसी सरकारी संस्थाओं द्वारा कैमरा ट्रैप में इन दुर्लभ जीवों का दर्ज किया जाना संरक्षण प्रयासों को मजबूत करेगा और विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियों को बचाने में मददगार साबित हो सकता है।

--आईएएनएस

वीसी