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दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर चीन कर रहा 'खेल', तिब्बत में बढ़ेगा आक्रोश: रिपोर्ट

 

बीजिंग, 17 अक्टूबर (आईएएनएस)। बीजिंग का दलाई लामा से बातचीत से इनकार उसकी सोची-समझी ‘इंतजार कराने की रणनीति’ का हिस्सा है। एक रिपोर्ट के अनुसार वेटिंग गेम के तहत चीन को उम्मीद है कि भविष्य में वो लामा के उत्तराधिकारी को नियंत्रित कर तिब्बत मुद्दे को कमजोर कर देगा।

रिपोर्ट में इस आदेश को तिब्बती बौद्ध धर्म मूल्यों की अनदेखी करार दिया गया है। साथ ही, इसमें चेतावनी दी गई है कि इससे विरोध और तेज हो सकता है और तिब्बत मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय तौर पर ठीक-ठाक समर्थन मिल सकता है।

14वें दलाई लामा के भतीजे खेद्रूब थोंडुप ने 'द तिब्बत एक्सप्रेस' में लिखा, "बीजिंग ने लगातार दलाई लामा के साथ बातचीत करने से इनकार किया है। यह रुख कोई रणनीतिक दुविधा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है: चीनी नेतृत्व 'वेटिंग गेम' (जानबूझकर टालना) अपना रहा है। उन्हें उम्मीद है कि दलाई लामा के बाद वे उत्तराधिकार को नियंत्रित कर सकेंगे और तिब्बत के मुद्दे को बेअसर कर देंगे। हालांकि इस तरीके से उन्हें थोड़े समय के लिए नियंत्रण मिल सकता है, लेकिन इससे उनकी वैधता, स्थिरता और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए बड़े जोखिम पैदा हो सकते हैं।"

थोंडुप के अनुसार, बीजिंग बातचीत करने से इसलिए कतराता है क्योंकि उसे डर है कि ऐसा करने से दलाई लामा को राजनीतिक वैधता मिल जाएगी। यह उनके उस दावे के उलट होगा, जिसमें वे दलाई लामा को एक 'अलगाववादी' बताते हैं।

उन्होंने बताया कि चीनी अधिकारियों को यह भी डर है कि अगर तिब्बत को कोई रियायत दी गई, तो अन्य अल्पसंख्यक क्षेत्रों का हौसला बढ़ सकता है और वे भी ज्यादा स्वायत्तता की मांग कर सकते हैं। इससे चीन की केंद्रीकृत शासन व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है।

बीजिंग की मंशा पर सीधा-सीधा वार करते हुए उन्होंने आगे लिखा, दरअसल, बीजिंग नियंत्रण वाली व्यवस्था के जरिए अगला दलाई लामा नियुक्त करना चाहता है, ताकि धार्मिक मामलों पर अपने अधिकार के दावे को और मजबूत कर सके।

थोंडुप ने कहा, "बीजिंग की ‘इंतजार की नीति’ (वेटिंग गेम) तीन धारणाओं पर टिकी है। पहला, दलाई लामा के बिना निर्वासन में रह रहा तिब्बती समुदाय बिखर जाएगा। दूसरा, सरकार द्वारा नियुक्त दलाई लामा से निर्वासित समुदाय के उत्तराधिकारी की वैधता खत्म हो जाएगी। तीसरा, उनके निधन के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की रुचि कम हो जाएगी।"

धार्मिक वैधता के सामने खड़ी चुनौती पर जोर देते हुए, उन्होंने कहा कि दुनिया भर के तिब्बती बौद्ध शायद राज्य द्वारा नियुक्त दलाई लामा को स्वीकार करने से इनकार कर दें, जिससे बीजिंग का अधिकार कमजोर पड़ जाएगा।

थोंडुप ने चेतावनी दी कि उत्तराधिकार से जुड़े विवाद तिब्बत के लिए वैश्विक समर्थन को कम करने के बजाय और बढ़ा सकते हैं। वहीं, जबरदस्ती थोपे गए कदम लोगों में नाराजगी बढ़ा सकते हैं और तिब्बतियों को चीन से और दूर कर सकते हैं।

बीजिंग के लिए इस नीति के नतीजों का आकलन करते हुए, थोंडुप ने कहा कि इस तरीके से शायद थोड़े समय के लिए नियंत्रण मिल जाए, लेकिन इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। जिसमें दीर्घकालिक स्थिरता और देश की अंतर्राष्ट्रीय साख का नुकसान शामिल है।

उन्होंने कहा, “निर्वासित तिब्बतियों के लिए, उत्तराधिकार को लेकर योजना बनाना और एकता बनाए रखना बीजिंग के नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। अंतरराष्ट्रीय पक्षों के लिए, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक संरक्षण के मुद्दों पर लगातार जुड़े रहना जरूरी होगा, ताकि बीजिंग की रणनीति को सफल न होने दिया जाए।”

--आईएएनएस

केआर/