कलकत्ता हाईकोर्ट ने एआईएसएफ की याचिका खारिज की, 'लिफाफा' चुनाव चिह्न बहाल करने से इनकार
कोलकाता, 30 सितंबर (आईएएनएस)। कलकत्ता हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट (एआईएसएफ) की उस याचिका को बुधवार को खारिज कर दिया, जिसमें पार्टी ने अपना 'लिफाफा' चुनाव चिह्न बहाल करने की मांग की थी। इससे राज्य में होने वाले उपचुनाव से पहले पार्टी को बड़ा झटका लगा है।
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के जस्टिस कृष्णा राव ने 28 सितंबर को मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अपने फैसले में जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि कोर्ट अगले महीने पश्चिम बंगाल में दो विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में दखल नहीं देना चाहता, इसलिए याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार किया जाता है।
बता दें कि पूर्वी मेदिनीपुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट और मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर विधानसभा सीट पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं और 9 अक्टूबर को मतगणना होगी। एआईएसएफ ने नंदीग्राम से अपना उम्मीदवार उतारा है।
एआईएसएफ के विधायक नौशाद सिद्दीकी, जो पश्चिम बंगाल विधानसभा में पार्टी के इकलौते प्रतिनिधि हैं, ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी थी। उन्होंने दलील दी थी कि उन्होंने 2021 और 2026 में भांगड़ विधानसभा सीट से 'लिफाफा' चुनाव चिह्न पर ही चुनाव लड़ा और जीता था।
दरअसल, इस महीने की शुरुआत में भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) ने 'लिफाफा' चिह्न ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के गुट को आवंटित कर दिया था, जिसे 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम दिया गया है।
नौशाद सिद्दीकी ने इसी फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था कि जब वह दक्षिण 24 परगना जिले की भांगड़ विधानसभा सीट से दो बार पहले 2021 और फिर 2026 में इसी 'लिफाफा' चिह्न पर चुनाव लड़े और जीते, तो इसे वापस लेने का कोई कारण नहीं है।
वहीं, चुनाव आयोग के वकील ने दलील दी कि 'लिफाफा' एक फ्री सिंबल है और एआईएसएफ जैसी गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों का किसी खास आरक्षित चिन्ह पर स्थायी अधिकार नहीं होता।
अब कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज करने के बाद एआईएसएफ के पास नंदीग्राम उपचुनाव 'अलमारी' चिह्न पर ही लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
इससे पहले एक सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने टिप्पणी की थी कि अगर चुनाव आयोग ने 'लिफाफा' चिह्न को किसी और को देने के बजाय फ्रीज करने का विकल्प चुना होता, तो इस विवाद से बचा जा सकता था। हालांकि, अंत में कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं देने का फैसला किया।
--आईएएनएस
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