पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग: रिपोर्ट
इस्लामाबाद, 17 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग और पश्चिमी लोकतंत्रों में इस्लामोफोबिया का राजनीतिकरण-दोनों ही ऐसी साझा रणनीतियों को दर्शाते हैं, जिनका उद्देश्य आलोचना को दबाना, चरमपंथी विचारधाराओं को संरक्षण देना और जवाबदेही से बचना है। यह खुलासा एक रिपोर्ट में किया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये दोनों तंत्र न केवल धर्म के बारे में सार्वजनिक समझ को कमजोर करते हैं, बल्कि सामाजिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा देते हैं। वहीं, हिंसा के वास्तविक अपराधी अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए आस्था को हथियार बनाते हैं।
पाकिस्तान क्रिश्चियन पोस्ट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, “कट्टरपंथी समूहों ने कानूनी ढांचों और सामाजिक कथाओं- दोनों का दुरुपयोग कर हिंसक विचारधाराओं को बचाने और जांच से बच निकलने के तरीके विकसित कर लिए हैं। पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों का अक्सर गलत इस्तेमाल किया जाता है- विरोधियों को डराने, निजी विवाद निपटाने या धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए। वहीं पश्चिमी देशों में ‘इस्लामोफोबिया’ शब्द का कभी-कभी राजनीतिक उपयोग चरमपंथी तत्वों को आलोचना और जवाबदेही से बचाने के लिए किया जाता है। अलग-अलग संदर्भों में मौजूद होने के बावजूद, दोनों ही तंत्र असहमति को दबाने और धर्म व उग्रवाद की समझ को विकृत करने का काम करते हैं।”
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपों का असमान रूप से असर धार्मिक अल्पसंख्यकों (खासतौर पर ईसाइयों) पर पड़ता है। दस्तावेज़ी मामलों का हवाला देते हुए कहा गया कि “निजी रंजिश, कार्यस्थल विवाद, पेशेवर ईर्ष्या या धार्मिक पूर्वाग्रह को अक्सर आपराधिक आरोपों में बदल दिया जाता है, ताकि दूसरे धर्मों के लोगों को चुप कराया जा सके या नुकसान पहुंचाया जा सके। आरोपियों के परिवारों को लंबे समय तक हिरासत, सामाजिक बहिष्कार और न्यायेतर हिंसा की धमकियों का सामना करना पड़ता है।”
रिपोर्ट के अनुसार, जिन देशों में ईशनिंदा कानून नहीं हैं, वहां भी चरमपंथी तत्व इस्लामोफोबिया के राजनीतिकरण का सहारा लेते हैं। यह तरीका उग्रवादी नेटवर्क, जिहादी समूहों और इस्लामी कट्टरपंथ के प्रसार की जांच-पड़ताल को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया, “ये तत्व धार्मिक विचारधारा की आड़ में आम नागरिकों, सुरक्षा बलों और राज्य संस्थानों पर हिंसक हमले जारी रखते हैं। पश्चिमी संदर्भों में, ऐसी गतिविधियों की आलोचना को कभी-कभी इस्लामोफोबिक करार दे दिया जाता है, जिससे चरमपंथी विचारधारा को धर्म के साथ गड्ड-मड्ड कर हिंसक अपराधियों को जवाबदेही से बचा लिया जाता है।”
रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा देना या शरीयत कानूनों के जरिए खास आस्थाओं या प्रथाओं को थोपना धार्मिक स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता। ऐसे कदम धार्मिक जबरदस्ती के रूप हैं, जिनका मकसद ईसाइयों सहित अन्य अल्पसंख्यकों और भिन्न आस्थाओं के लोगों पर प्रभुत्व कायम करना है।
रिपोर्ट में निष्कर्ष के तौर पर कहा गया, “किसी विचारधारा या धार्मिक कानून का इस्तेमाल दूसरों पर हावी होने, दबाने या वैकल्पिक विश्वासों को कुचलने के लिए करना- आस्था को सामाजिक या राजनीतिक नियंत्रण का औजार बना देता है। यह बहुलतावाद, मानवाधिकारों और सहअस्तित्व के उन सिद्धांतों को कमजोर करता है, जिन पर सच्ची धार्मिक स्वतंत्रता आधारित होती है।”
--आईएएनएस
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