रिपोर्ट का दावा: चीन बौद्ध धर्म का इस्तेमाल कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक एजेंडे के लिए कर रहा है
ब्रसेल्स, 4 जुलाई (आईएएनएस)। चीन में बौद्ध धर्म को आध्यात्मिक आस्था के बजाय राजनीतिक नियंत्रण के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मंदिरों को पर्यटन केंद्रों में बदला जा रहा है, भिक्षुओं को सरकारी कर्मचारियों की तरह संचालित किया जा रहा है और धार्मिक ग्रंथों को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि वे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के प्रति निष्ठा को बढ़ावा दें।
'यूरोपियन टाइम्स' में प्रकाशित लेख में खेदरूब थोंडुप ने लिखा है कि चीन का बौद्ध धर्म के प्रति रुख आस्था पर नहीं, बल्कि राजनीतिक उपयोगिता पर आधारित है। उनके अनुसार, संवैधानिक रूप से नास्तिक होने के बावजूद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी धर्म को तभी स्वीकार करती है, जब उसे सांस्कृतिक विरासत, पर्यटन या समाजवाद के पूरक के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। लेकिन जहां बौद्ध धर्म राजनीतिक या जातीय पहचान से जुड़ता है, विशेषकर तिब्बत में, वहां उसे खतरे के रूप में देखा जाता है।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीजिंग यह कहता है कि तिब्बती लामा, यहां तक कि भविष्य के दलाई लामा के पुनर्जन्म को मंजूरी देने का अधिकार भी उसके पास है। लेख के अनुसार, यह तिब्बती बौद्ध परंपरा को उसकी आध्यात्मिक विरासत से अलग कर राज्य के नियंत्रण में लाने का प्रयास है।
रिपोर्ट के मुताबिक, तिब्बत के मठों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और भिक्षुओं को 'देशभक्ति शिक्षा' से गुजरना पड़ता है। इसमें कहा गया है कि धार्मिक शिक्षा की जगह राजनीतिक विचारधारा को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि तिब्बती बौद्ध अनुष्ठानों, त्योहारों और शिक्षाओं पर प्रतिबंध या कड़ा नियमन लागू किया गया है। कई धार्मिक परंपराओं को 'लोक संस्कृति' के रूप में पेश किया जा रहा है, जिससे उनका आध्यात्मिक स्वरूप कमजोर पड़ रहा है।
लेख में यह भी दावा किया गया है कि दलाई लामा के प्रति सार्वजनिक निष्ठा को अपराध की तरह देखा जाता है और इसे सरकार विरोधी गतिविधि माना जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को बौद्ध विरासत का संरक्षक दिखाने के लिए मंदिरों के जीर्णोद्धार, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों और थाईलैंड, श्रीलंका तथा म्यांमार जैसे देशों में सरकारी समर्थन से तीर्थ यात्राओं को बढ़ावा देता है। हालांकि, तिब्बत में, जहां बौद्ध धर्म स्थानीय पहचान और संस्कृति से गहराई से जुड़ा है, वहां सरकार धार्मिक गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण बनाए हुए है।
लेख में दावा किया गया है कि तिब्बत में बौद्ध धर्म पर बढ़ता नियंत्रण तिब्बती पहचान और असहमति को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा है। साथ ही यह भी कहा गया है कि आस्था को पूरी तरह राजनीतिक नियंत्रण में लाना संभव नहीं है और यही चीन की इस नीति की सबसे बड़ी चुनौती है।
--आईएएनएस
डीएससी