×

पश्चिम बंगाल में ‘असली तृणमूल’ की लड़ाई में नया मोड़, कोलकाता में 28 अगस्त को आमने-सामने होंगे दोनों गुट

 

नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'असली तृणमूल' की लड़ाई लगातार दिलचस्प होती जा रही है। मई में आए चुनाव नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ विवाद अब पार्टी को दो अलग-अलग गुटों में बांट चुका है। दोनों गुट खुद को पार्टी का असली उत्तराधिकारी बता रहे हैं और यह संघर्ष अब विधानसभा से लेकर सड़कों तक पहुंच गया है।

राज्य विधानसभा में बागी गुट को पर्याप्त तृणमूल विधायकों का समर्थन मिलने के बाद उसके नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिल चुकी है।

इसके बाद अगला मुकाबला 21 जुलाई को कोलकाता की सड़कों पर देखने को मिला। यह दिन तृणमूल कांग्रेस के लिए खास महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन हर साल शहीद दिवस मनाया जाता है। यह कार्यक्रम 1993 में यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हुई पुलिस फायरिंग की याद में आयोजित किया जाता है, जिसका नेतृत्व उस समय ममता बनर्जी कर रही थीं।

अब यह राजनीतिक लड़ाई 28 अगस्त को तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर एक नया मोड़ लेने जा रही है। 21 जुलाई की तरह इस बार भी दोनों गुट अलग-अलग भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों और नेताओं की नजर इस बात पर रहेगी कि कौन-सा गुट ज्यादा भीड़ जुटाने में सफल रहता है और दोनों पक्षों के नेता अपने-अपने भाषणों में क्या संदेश देते हैं।

एक तरफ ममता बनर्जी का 'कालीघाट गुट' है, जिसकी ताकत उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और पार्टी की मूल विरासत मानी जाती है।

दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी का गुट है, जिसके पास विधानसभा में संख्या बल है और जिसे संस्थागत मान्यता भी प्राप्त है।

कालीघाट गुट का मानना है कि विधानसभा में संख्या बल होने भर से ममता बनर्जी की भावनात्मक और ऐतिहासिक पहचान को समाप्त नहीं किया जा सकता। यह गुट ममता बनर्जी के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द बना है। वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ उनके आक्रामक आंदोलनों से लेकर 2011 में सत्ता हासिल करने तक की यात्रा को इस गुट की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।

ममता बनर्जी की कार्यशैली लंबे समय से बेहद व्यक्तिगत और केंद्रीकृत रही है। पार्टी में फैसले अक्सर उनके कालीघाट स्थित आवास से ही लिए जाते रहे हैं। इसी वजह से एक समय यह कहावत भी प्रचलित हुई कि तृणमूल में केवल 'एक पद' है और बाकी सभी 'लैंपपोस्ट' हैं, यानी अन्य नेता सिर्फ ममता की लोकप्रियता की रोशनी में ही चमकते हैं।

वहीं, ऋतब्रत बनर्जी का गुट खुद को तृणमूल की संगठनात्मक ताकत का व्यावहारिक उत्तराधिकारी बताता है। इस गुट को करीब 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत को मिली मान्यता ने इस गुट को संस्थागत मजबूती भी दी है।

इस गुट की ताकत केवल ऋतब्रत बनर्जी ही नहीं, बल्कि फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, अनुब्रत मंडल, और जावेद खान जैसे नेताओं का समर्थन भी है। ये सभी कभी ममता बनर्जी के करीबी माने जाते थे।

21 जुलाई को ऋतब्रत गुट ने कोलकाता के मेयो रोड पर एक समानांतर रैली आयोजित की थी, जो ममता बनर्जी की बिरला तारामंडल के पास हुई सभा से लगभग तीन किलोमीटर दूर थी।

समाचार रिपोर्टों के अनुसार, दोनों रैलियों में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। एक ही दिन तृणमूल के दो अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन ने पार्टी के अंदर गहराते विभाजन को साफ तौर पर सामने ला दिया।

अब 28 अगस्त का कार्यक्रम छात्र राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टीएमसीपी लंबे समय से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति में पार्टी का मजबूत आधार रही है।

दोनों गुटों का मानना है कि जो भी टीएमसीपी पर प्रभाव कायम करेगा, वह न केवल युवा कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल करेगा बल्कि 'असली तृणमूल' की वैचारिक पहचान तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

यह स्थिति कुछ हद तक महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन जैसी मानी जा रही है, जहां अंततः चुनाव आयोग और अदालतों को यह तय करना पड़ा था कि पार्टी का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन है।

पश्चिम बंगाल में भी भविष्य में तृणमूल की वैधता का सवाल रैलियों और संख्या बल के बजाय संवैधानिक संस्थाओं के जरिए तय हो सकता है, लेकिन फिलहाल दोनों गुट छात्र संगठन पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं और इसी के साथ 'असली तृणमूल' की लड़ाई का एक और महत्वपूर्ण अध्याय 28 अगस्त को कोलकाता में लिखा जाएगा।

--आईएएनएस

एएमटी/डीकेपी