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बांग्लादेश: यूनिवर्सिटी कैंपस में जमात ने अपनी पकड़ मजबूत की, पाकिस्तान-समर्थक एजेंडा को दे रहा बढ़ावा

 

लंदन, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। बांग्लादेश की कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी 'जमात-ए-इस्लामी' ने मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली पिछली अंतरिम सरकार से मिले समर्थन का फायदा उठाया है। पार्टी ने अपने छात्र संगठन 'इस्लामी छात्र शिबिर' के जरिए ढाका यूनिवर्सिटी और चटगांव यूनिवर्सिटी जैसे प्रमुख शिक्षण संस्थानों में अपनी मौजूदगी मजबूत की है। ये दावा एक रिपोर्ट करती है।

इसमें बताया गया है कि पार्टी अब ढाका में पाकिस्तान-समर्थक भावनाएं फैलाने के लिए अपने छात्र संगठन का इस्तेमाल कर रही है।

ब्रिटिश अखबार 'एशियन लाइट' की एक रिपोर्ट में इस पर प्रकाश डाला गया है। इसके मुताबिक, "ढाका यूनिवर्सिटी सेंट्रल स्टूडेंट्स यूनियन, जो अब 'इस्लामिक छात्र शिबिर' से जुड़ी है, ने हाल ही में यूनिवर्सिटी के म्यूजियम में पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीरें और भाषण प्रदर्शित किए थे। खास तौर पर चिंता की बात उनका एक भाषण था जो 1948 में ढाका के रेस कोर्स मैदान में दिया गया था, जिसमें जिन्ना ने पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों की भावनाओं को नजरअंदाज करते हुए घोषणा की थी कि पाकिस्तान की राजकीय भाषा 'सिर्फ और सिर्फ उर्दू' होगी। तीन दिन बाद ढाका यूनिवर्सिटी में दिए गए एक भाषण में उन्होंने अपनी बात दोहराई।"

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "गौर करने वाली बात है कि सत्ताधारी बीएनपी के छात्र संगठन 'जातीयतावादी छात्र दल' ने इस प्रदर्शन की निंदा करते हुए इसे 'शर्मनाक हरकत' बताया, जिससे यूनिवर्सिटी की छवि खराब हुई। इसके बाद ढाका यूनिवर्सिटी प्रशासन ने एक कमेटी बनाई है जो इस बात की जांच करेगी कि ये तस्वीरें कैसे प्रदर्शित की गईं।"

रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में एक प्रमुख कट्टरपंथी इस्लामी ताकत 'जमात-ए-इस्लामी' ने जुलाई 2024 के उस तथाकथित 'जुलाई विद्रोह' में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके कारण पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार को सत्ता से हटना पड़ा था।

इसके बाद, यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान पार्टी ने अपने संगठनात्मक नेटवर्क को और मजबूत किया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि सत्ताधारी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11-पार्टी विपक्षी गठबंधन के बीच टकराव का एक बड़ा मुद्दा पिछली अंतरिम सरकार के तहत तैयार किए गए प्रस्तावित संवैधानिक सुधार हैं।

जानकारों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि इन प्रस्तावित सुधारों का मकसद बांग्लादेश के संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कमजोर करना, प्रधानमंत्री के अधिकारों को सीमित करना और राष्ट्रपति के अधिकारों को बढ़ाना है, जिससे सरकार के अस्थिर होने का खतरा पैदा हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया, "बांग्लादेश में बीएनपी सांसदों ने संवैधानिक सुधार परिषद में शामिल होने से इनकार कर दिया था, क्योंकि बांग्लादेश के संविधान में ऐसी परिषद के गठन का कोई प्रावधान नहीं था। बीएनपी संवैधानिक सुधारों के मुद्दे की जांच के लिए एक संसदीय समिति बनाना चाहती थी। हालांकि, जमात और उसके सहयोगियों के सांसदों ने ऐसी संसदीय समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया है।"

--आईएएनएस

केआर/