जुलाई 2024 के विद्रोह के बाद बांग्लादेश में बढ़ी भीड़ हिंसा और कानून व्यवस्था की समस्या
ढाका, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)। जुलाई 2024 के विद्रोह के बाद से बांग्लादेश में भीड़ हिंसा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं का व्यापक पैटर्न देखने को मिल रहा है। लोगों में कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और पुलिस की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं। एक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।
‘ग्लोबल वॉयसेज’ की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के राजनीतिक उथल-पुथल के बाद सत्ता में आई अंतरिम सरकार की समीक्षा में भ्रष्टाचार विरोधी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल बांग्लादेश (टीआईबी) ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए भीड़ जुटाने की बढ़ती प्रवृत्ति को चिंताजनक बताया है। फरवरी 2026 के संसदीय चुनाव के बाद सत्ता में आई बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में भी यह सिलसिला जारी रहने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत आइरीन खान के हवाले से कहा गया है कि दोषियों को कार्रवाई से लगातार बच निकलने की स्थिति बांग्लादेश में इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही है।
रिपोर्ट ने ढाका स्थित मानवाधिकार संगठन ऐन ओ सालिश केंद्र (एएसके) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जनवरी से अगस्त 2026 के बीच बांग्लादेश में भीड़ हिंसा की घटनाओं में कम से कम 154 लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।
बांग्लादेशी टीवी पत्रकार रिफात आलम रिसान ने भीड़ की हिंसा का खुद सामना किया। दिसंबर 2025 में ढाका में कट्टरपंथी इस्लामी नेता शरीफ उस्मान बिन हादी को गोली मारे जाने के बाद वह रिपोर्टिंग और वीडियो फुटेज जुटाने के लिए ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचे थे। इसी दौरान भीड़ ने उन पर हमला कर दिया।
रिपोर्ट के मुताबिक, 20 सितंबर 2026 को ढाका में ‘ग्लोबल वॉयसेज’ से बातचीत में रिसान ने बताया कि भीड़ के किसी व्यक्ति द्वारा उन पर हादी को गोली मारने का आरोप लगाए जाने के बाद स्थिति अचानक बिगड़ गई।
उन्होंने बताया कि भीड़ में यह आरोप फैल गया कि उन्होंने हादी को गोली मारी है और अब दोबारा हमला करने आए हैं। इसके बाद लोगों ने बिना किसी जांच या पुष्टि के उन पर हमला कर दिया। उन्होंने बताया कि लोगों ने उन्हें पीटा और अस्पताल से बाहर निकाल दिया। एक समय वह सड़क पर गिर पड़े और भीड़ ने उनका फोन छीनने की भी कोशिश की। बाद में एक साथी टीवी पत्रकार और अन्य मीडियाकर्मियों ने उन्हें बचाया।
एक अन्य बांग्लादेशी टीवी पत्रकार जमाल रुहानी ने भीड़ हिंसा के तौर-तरीकों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आमतौर पर एक या दो लोग किसी व्यक्ति को निशाना बनाते हैं और उनके हमला करने के बाद आसपास मौजूद कई अन्य लोग भी उसमें शामिल हो जाते हैं।
रुहानी के अनुसार, मारपीट करने वाले लोगों को अक्सर यह भी पता नहीं होता कि जिस व्यक्ति पर हमला किया जा रहा है, वह वास्तव में दोषी है या नहीं। कई बार पीड़ित को यह तक पता नहीं होता कि उस पर आरोप क्या है। भीड़ में कोई सिर्फ यह कह देता है कि उसे मारो और लोग हमला शुरू कर देते हैं।
उन्होंने पुलिस की तैयारियों पर भी सवाल उठाए। रुहानी ने कहा कि 5 अगस्त के बाद पुलिस का मनोबल पहले जैसा नहीं रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन इलाकों में भीड़ हिंसा होती है, वहां पुलिस अक्सर पर्याप्त रूप से तैयार नहीं होती और लगातार सतर्क रहने की स्थिति नजर नहीं आती।
--आईएएनएस
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