इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दो पुलिसकर्मियों को लगाई कड़ी फटकार, आचरण को बताया अवमानना के समान
प्रयागराज/नई दिल्ली, 1 मार्च (आईएएनएस)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आर्म्स एक्ट के मामले में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और रिहाई में देरी को लेकर प्रयागराज पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि उनका यह आचरण दिशानिर्देशों की अवमानना के समान है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने प्रयागराज पुलिस द्वारा सचिन आर्य उर्फ सचिन भारतीय की गिरफ्तारी और हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया।
12 फरवरी को पारित आदेश में न्यायमूर्ति सिद्धार्थ की अगुवाई वाली पीठ ने कहा था कि याचिकाकर्ता को आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 3 और 25(1बी)(ए) के तहत गिरफ्तार किया गया था, जिनमें दो से पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। इसलिए यह गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा सतेंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई व अन्य मामले में निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी।
तत्काल रिहाई का निर्देश देते हुए हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि याचिकाकर्ता को “प्रतिवादी संख्या 4 और 5 को इस आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराए बिना ही तुरंत रिहा किया जाए।” इस दौरान धूमनगंज थाने के थाना प्रभारी (एसएचओ) अदालत में उपस्थित थे, इसलिए पीठ ने स्पष्ट किया था कि इस आदेश का पालन तुरंत किया जाए।
हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि उसके निर्देशों का पालन लगभग 20 घंटे बाद किया गया। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ की अगुवाई वाली पीठ ने टिप्पणी की, “यह स्पष्ट है कि इस न्यायालय के आदेश का पालन लगभग 20 घंटे बाद किया गया। इससे प्रतीत होता है कि प्रतिवादी संख्या 4 और 5 को देश के कानून का कोई सम्मान नहीं है।”
अदालत ने प्रयागराज के पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि वे धूमनगंज के एसएचओ और टीपी नगर प्रभारी उपनिरीक्षक दिग्विजय सिंह के खिलाफ तीन दिन के भीतर उचित कार्रवाई करें और अगली सुनवाई से पहले अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
23 फरवरी को दोबारा सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कार्रवाई पर असंतोष जताया और पुलिस आयुक्त को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इसमें संबंधित अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का विवरण और सभी थानों में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के प्रसार और पालन के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देने को कहा गया।
पीठ ने कहा, “यह याचिका बंदी प्रत्यक्षीकरण की प्रकृति की है, इसलिए मुआवजे का निर्देश नहीं दिया जा सकता। हालांकि, याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र है।”
हाई कोर्ट ने कहा कि प्रयागराज के पुलिस आयुक्त से अपेक्षा है कि वे पहले से शुरू की गई अनुशासनात्मक प्रक्रिया को निष्कर्ष तक पहुंचाएं।
--आईएएनएस
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