सैनिक सम्मान के लिए लड़ता है, इनाम के लिए नहीं: मिजोरम के राज्यपाल वीके सिंह
नई दिल्ली, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। मिजोरम के राज्यपाल और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि एक सैनिक इनाम के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य, सम्मान और इस विश्वास के लिए लड़ता है कि उसका बलिदान देश के काम आएगा।
वह दिल्ली विधानसभा में आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। यह कार्यक्रम औपनिवेशिक काल में इसी भवन में हुए 1918 के युद्ध सम्मेलन (युद्ध-सम्मेलन) की 108वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया गया।
इस संगोष्ठी का विषय 'प्रथम विश्वयुद्ध और भारत' था। कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने की।
जनरल वीके सिंह ने भारतीय सैनिकों की विरासत पर बात करते हुए कहा कि वैश्विक युद्धों में भारतीय सैनिकों का योगदान बहुत बड़ा रहा, लेकिन उसे अक्सर वह पहचान नहीं मिली, जिसका वह हकदार था।
उन्होंने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध में 13 लाख से ज्यादा भारतीय सैनिकों ने हिस्सा लिया था, जिनमें करीब 74 हजार सैनिक शहीद हुए। इन शहीदों के नाम इंडिया गेट पर दर्ज हैं।
उन्होंने कहा कि भारत का योगदान सिर्फ सैनिक भेजने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें आर्थिक मदद, रसद और संसाधन भी शामिल थे। उस समय भारत अंग्रेजों के अधीन था, फिर भी उसने युद्ध में बड़ी भूमिका निभाई।
जनरल सिंह ने कहा कि कॉमनवेल्थ देशों में शहीद सैनिकों को याद करने की परंपरा यह दिखाती है कि दुनिया भारतीय सैनिकों के योगदान का सम्मान करती है, भले ही भारत में उन्हें हमेशा पर्याप्त पहचान न मिली हो।
कार्यक्रम में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के उपाध्यक्ष विजय गोयल, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट, पूर्व सैनिकों का एक प्रतिनिधिमंडल, इतिहासकार, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दिल्ली सरकार के स्कूलों के शिक्षक भी मौजूद रहे।
मिजोरम के राज्यपाल ने कहा कि भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध ''गुलाम मानसिकता'' के साथ नहीं लड़ा, बल्कि कर्तव्य और सम्मान की गहरी भावना के साथ लड़ा। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों को भगवद्गीता के दर्शन से प्रेरणा मिली।
उन्होंने कहा कि सैनिक निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपनी यूनिट के सम्मान और इस उम्मीद में लड़ते हैं कि उनका संघर्ष देश के काम आएगा।
उन्होंने चीन-भारत युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय सैनिकों ने संसाधनों और हथियारों की भारी कमी के बावजूद अद्भुत साहस और धैर्य दिखाया।
जनरल सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों की बहादुरी का जिक्र करते हुए खुदादाद खान जैसे विक्टोरिया क्रॉस विजेताओं का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ये सम्मान भारतीय सैनिकों के साहस और संकल्प की गवाही हैं।
उन्होंने यूरोप, पूर्वी अफ्रीका और मध्य-पूर्व जैसे मोर्चों पर भारतीय सेना की भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने हाइफा की ऐतिहासिक जीत का भी उल्लेख किया, जिसकी याद में दिल्ली में तीन मूर्ति हाइफा चौक बनाया गया है।
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि 1918 का युद्ध सम्मेलन विश्वास और विश्वासघात, दोनों का प्रतीक था। भारत ने स्वशासन की उम्मीद में प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन का पूरा साथ दिया था।
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी समेत कई भारतीय नेताओं ने सैनिक भर्ती को प्रोत्साहित किया था, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि सहयोग के बदले भारत को आजादी की दिशा में अधिकार मिलेंगे, लेकिन सुधारों की जगह भारत को रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग जैसी त्रासदी मिली।
उन्होंने कहा कि करीब 13 लाख भारतीय सैनिकों ने फ्रांस, मेसोपोटामिया, गैलीपोली और पूर्वी अफ्रीका जैसे मोर्चों पर युद्ध लड़ा, जिनमें 74 हजार से ज्यादा सैनिक विदेशी धरती पर शहीद हुए।
विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि 1918 के युद्ध सम्मेलन की कार्यवाही को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के सहयोग से प्रकाशित किया गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस इतिहास को समझ सकें।
--आईएएनएस
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