9/11 हमले के 25 साल बाद भी पाकिस्तान अपने फैसलों का नतीजा भुगत रहा
नई दिल्ली, 11 सितंबर (आईएएनएस)। अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकी हमले को 25 साल हो चुके हैं। इस हमले में न्यूयॉर्क सिटी के ट्विन टावर्स को निशाना बनाया गया था, जो इस हमले में पूरी तरह तबाह हो गए थे और हजारों लोगों की जान चली गई थी।
इसके बाद दुनिया ने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बदलाव देखे। वैश्विक सुरक्षा नीतियां और कूटनीतिक संबंध पूरी तरह बदल गए, वहीं अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ अपने अभियान को और तेज कर दिया।
हमले के कुछ ही हफ्तों बाद पाकिस्तान को अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में 'फ्रंटलाइन सहयोगी' घोषित किया गया। उसके परमाणु परीक्षणों के बाद लगाए गए प्रतिबंध हटा दिए गए और अरबों डॉलर की सहायता मिलने लगी।
कम समय में इससे पाकिस्तान का रणनीतिक महत्व बढ़ गया और उसकी कमजोर पड़ रही अर्थव्यवस्था को राहत मिली। माना जाता है कि अफगानिस्तान में सोवियत कब्जे के खिलाफ 1980 के दशक में चलाए गए गुप्त अभियान के बाद पाकिस्तान को इतनी बड़ी मात्रा में आर्थिक सहायता पहली बार मिली थी।
2001 से 2019 के बीच पाकिस्तान को अमेरिका से 34 अरब डॉलर से अधिक की सहायता मिलने की खबरें हैं, जिसका बड़ा हिस्सा आतंकवाद-रोधी सहयोग से जुड़ा था। इस दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका को रसद सहायता, खुफिया सहयोग और सैन्य ठिकानों तक पहुंच उपलब्ध कराई।
इस तरह 9/11 हमलों के तुरंत बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया।
हालांकि, अपहरणकर्ताओं में कोई भी पाकिस्तानी नागरिक शामिल नहीं था, लेकिन 2003 में रावलपिंडी से आतंकवादी मास्टरमाइंड खालिद शेख मोहम्मद की गिरफ्तारी ने पाकिस्तान का नाम अल-कायदा नेटवर्क से स्थायी रूप से जोड़ दिया।
इसके आठ साल बाद अल-कायदा के संस्थापक और 9/11 हमलों के मुख्य साजिशकर्ता ओसामा बिन लादेन को अमेरिका की नेवी सील टीम ने पाकिस्तान के एबटाबाद में एक अभियान के दौरान मार गिराया।
बता दें कि उत्तरी पाकिस्तान का शांत शहर एबटाबाद, इस्लामाबाद से लगभग 80 किलोमीटर दूर है और अफगानिस्तान के तोरा बोरा क्षेत्र की उन गुफाओं से करीब 400 किलोमीटर दूर है, जिन्हें कभी ओसामा बिन लादेन का ठिकाना माना जाता था।
दुनिया के सबसे वांछित आतंकवादी का पाकिस्तान की राजधानी के इतने करीब और सीमा पार के दुर्गम पहाड़ी इलाकों से दूर रहना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
इस बीच, पाकिस्तान के मीडिया में इस सप्ताह प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया कि समय के साथ इस सहयोग की कीमत फायदे से अधिक भारी पड़ने लगी। पाकिस्तान के भीतर आतंकवाद तेजी से बढ़ा और दो दशकों में 70,000 से अधिक लोगों की जान चली गई।
रिपोर्टों में 9/11 की आर्थिक विरासत को दोधारी तलवार बताया गया है।
एक ओर इस घटना के बाद मिली आर्थिक सहायता और निवेश ने अल्पकालिक रूप से अर्थव्यवस्था को स्थिर किया, वहीं दूसरी ओर आतंकवाद और अस्थिरता ने कहीं अधिक नुकसान पहुंचाया, जिससे पाकिस्तान और कमजोर तथा बाहरी सहायता पर अधिक निर्भर हो गया।
पाकिस्तान के समाचार पत्र डॉन और द न्यूज इंटरनेशनल में प्रकाशित विश्लेषणों में कहा गया कि विदेशी सहायता ने तत्काल राहत तो दी, लेकिन स्थायी औद्योगिक विकास नहीं कर सकी। इसके बजाय देश बाहरी वित्तीय सहायता पर निर्भर होता चला गया और उसकी अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक परिवर्तनों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई।
पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, अस्थिरता के कारण निवेश प्रभावित हुआ, व्यापार बाधित हुआ और पर्यटन उद्योग कमजोर पड़ गया, जिससे देश को 150 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ।
पाकिस्तान ऑब्जर्वर की एक रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका से अरबों डॉलर की सहायता मिलने के बावजूद पाकिस्तान टिकाऊ आर्थिक विकास हासिल नहीं कर सका। कई विश्लेषकों का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध ने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा स्थिति को भी जटिल बना दिया और उसकी पारंपरिक चुनौतियों से कहीं अधिक नए खतरे पैदा कर दिए।
अफगानिस्तान में तालिबान का उदय, देश के भीतर सांप्रदायिक उग्रवाद, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में विद्रोह और अलगाववादी गतिविधियां 9/11 के बाद की प्रमुख चुनौतियां बनकर उभरीं।
कूटनीतिक स्तर पर भी पाकिस्तान धीरे-धीरे अलग-थलग पड़ता गया और उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर दबाव बढ़ने लगा।
अफगानिस्तान के साथ उसके संबंध भी खराब होते गए, जबकि पहले पाकिस्तान ने अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए की गुप्त मदद से मुजाहिदीन लड़ाकों और बाद में तालिबान को समर्थन, प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराए थे।
सोवियत संघ के पतन के बाद पाकिस्तान पर दोहरी नीति अपनाने के आरोप लगे। उस पर एक ओर अमेरिका के आतंकवाद विरोधी अभियान का समर्थन करने और दूसरी ओर तालिबान नेताओं को संरक्षण देने के आरोप लगे। इससे उसकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा।
2011 में एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के मिल जाने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को लेकर संदेह और बढ़ा दिया।
पाकिस्तान ऑब्जर्वर की रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान की नीतियां मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में नहीं बदल सकीं, बल्कि अविश्वास और हाशिए पर जाने की स्थिति पैदा हुई। आज भी पाकिस्तान 9/11 से पहले और उसके बाद लिए गए फैसलों के परिणामों के साथ जी रहा है, और इस घटना की छाया अब भी उसके ऊपर बनी हुई है।
--आईएएनएस
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