हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर पिघलने से बढ़ा खतरा, एक्सपर्ट बोले-संवेदनशील इलाकों में रोकें निर्माण
श्रीनगर, 31 अगस्त (आईएएनएस)। तिब्बत-चीन सीमा से नेपाल तक आई भीषण आपदा के बाद हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर चिंता बढ़ गई है। पर्यावरणविद् और हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञ एजाज रसूल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भी हिमालयी क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण ऐसी आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। उन्होंने सरकार से संभावित आपदाओं से निपटने के लिए व्यापक कंटिंजेंसी प्लान, वॉटर मैनेजमेंट पॉलिसी और हाजर्ड मैपिंग को मजबूत करने की जरूरत बताई।
नेपाल में हुई आपदा को लेकर एजाज रसूल ने कहा कि शुरुआत में इसे भूकंप से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन वैज्ञानिक जांच में इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। ग्लेशियर से बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरने और संभावित ग्लेशियर झील के पानी के अचानक बहने से भारी तबाही हो सकती है। ऐसी स्थिति में पानी का तेज बहाव अपने रास्ते में आने वाले पुलों, ढांचों, पेड़ों और आबादी को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। नेपाल में हुई तबाही को इसी खतरे का उदाहरण बताते हुए उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन को इस आपदा के व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है।
एजाज रसूल ने बताया कि जम्मू-कश्मीर भी हिमालयी क्षेत्र में स्थित है और पिछले चार-पांच वर्षों में यहां जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि क्षेत्र के कई ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। उन्होंने थाजीवास, कोलाहोई, कौसरनाग और शोपियां क्षेत्र के ग्लेशियरों का उल्लेख करते हुए कहा कि कश्मीर चारों तरफ से हिमालयी ग्लेशियरों और जलस्रोतों से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा लद्दाख के ग्लेशियरों का प्रभाव भी क्षेत्र के जल तंत्र पर पड़ता है।
विशेषज्ञ ने चेतावनी दी कि यदि भूकंप, क्लाउडबर्स्ट या किसी अन्य प्राकृतिक घटना के कारण किसी ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटता है अथवा ग्लेशियर झील का बांध टूटता है तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है। इससे निचले इलाकों में फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। कश्मीर के कुछ प्रमुख संवेदनशील क्षेत्रों का जिक्र करते हुए उन्होंने कौसरनाग, गंगाबल और कोलाहोई ग्लेशियर को महत्वपूर्ण हॉटस्पॉट बताया।
उन्होंने कहा कि लद्दाख के कई ग्लेशियर भी व्यापक हिमालयी जल प्रणाली का हिस्सा हैं और वहां होने वाले बदलावों का प्रभाव जम्मू-कश्मीर पर पड़ सकता है। क्षेत्र में ग्लेशियर लेक आउटफ्लो और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं की घटनाएं बढ़ती दिखाई दे रही हैं। पहले ऐसी घटनाएं कभी-कभार सामने आती थीं, लेकिन अब अलग-अलग इलाकों से बाढ़, मडस्लाइड और अचानक पानी के तेज बहाव की खबरें लगातार सामने आती हैं।
विशेषज्ञ ने कहा कि जलवायु परिवर्तन को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके लिए जम्मू-कश्मीर में एक प्रभावी वॉटर मैनेजमेंट पॉलिसी बनाने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि जलाशयों और अन्य जल निकायों में प्रदूषण कम करने के साथ-साथ पानी के इनफ्लो और आउटफ्लो को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जाना चाहिए। अधिक पानी आने पर उसे सुरक्षित तरीके से जमा करने और आवश्यकता पड़ने पर नियंत्रित रूप से छोड़ने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम को लेकर रसूल ने कहा कि जलवायु की घटनाओं का सटीक समय पहले से बताना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि क्लाइमेट का कोई कैलेंडर नहीं है। बाढ़ या सूखे जैसी घटनाओं का अनुमान मुख्य रूप से संभाव्यता विश्लेषण के आधार पर लगाया जाता है। जब किसी क्षेत्र में ऐसी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही हो तो जोखिम कम करने के लिए पहले से तैयारी की जा सकती है। इसके लिए उन इलाकों की पहचान जरूरी है जहां ग्लेशियर झील के फटने, फ्लैश फ्लड या मडस्लाइड का खतरा अधिक है।
उन्होंने आगे कहा कि हाजर्ड मैपिंग के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण को रोका जाना चाहिए। जहां आपदा का खतरा अधिक है, वहां मकान और अन्य संरचनाएं बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। बेहतर निगरानी, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान, नियंत्रित जल प्रबंधन और आपदा से पहले की तैयारी के जरिए जम्मू-कश्मीर में संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
--आईएएनएस
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