मिडिल ईस्ट में महा-संकट! तेल की सप्लाई ठप, हूतियों के सामने बेबस सऊदी अरब के 'इस्लामिक NATO' का सच
मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। यमन के हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों ने सऊदी अरब की ऊर्जा व्यवस्था और दुनिया की तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हाल के हमलों के बाद सऊदी अरब की अहम East-West तेल पाइपलाइन बंद करनी पड़ी है, जिससे वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कुछ ही हफ्ते पहले बने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के रक्षा समझौते की भी पहली बड़ी परीक्षा ले ली है। इस समझौते को कई रिपोर्ट्स में 'Islamic NATO' की संज्ञा दी जा रही है, हालांकि यह औपचारिक रूप से NATO नहीं है।
सऊदी की तेल सप्लाई पर बढ़ा संकट
ताजा घटनाक्रम में सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी East-West पाइपलाइन को नुकसान पहुंचने के बाद इसे अस्थायी रूप से बंद किया गया है। यह पाइपलाइन फारस की खाड़ी से तेल को लाल सागर के रास्ते तक पहुंचाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और सामान्य परिस्थितियों में इसके जरिए रोजाना लाखों बैरल तेल भेजा जा सकता है।
Reuters के मुताबिक, इस स्थिति के बीच मंगलवार को Brent crude 108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। बाजार में चिंता इस बात की है कि अगर पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रही और अन्य रास्तों पर भी बाधा बनी रही तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है।
हूतियों ने क्यों बढ़ाए हमले?
यमन के हूती संगठन और सऊदी अरब के बीच संघर्ष फिर तेज हो गया है। हाल के दिनों में हूतियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्सों में ऊर्जा प्रतिष्ठानों और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है।
8 सितंबर को हुए हमलों के बाद सऊदी अधिकारियों ने कई ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों की पुष्टि की थी और दर्जनों लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद सऊदी अरब ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी।
अब संघर्ष का एक बड़ा केंद्र बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी बन गया है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार एवं ऊर्जा मार्गों में शामिल है।
'इस्लामिक NATO' की पहली बड़ी परीक्षा
सऊदी अरब ने अगस्त में पाकिस्तान और तुर्की के साथ एक संयुक्त रक्षा समझौता किया था। इस समझौते का उद्देश्य तीनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और सामूहिक रक्षा क्षमता को मजबूत करना है। Reuters के मुताबिक, तुर्की के रक्षा मंत्री ने इसकी तुलना NATO के Article 5 से की थी।
लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि अगर सऊदी अरब पर हूतियों के हमले लगातार बढ़ते हैं तो क्या पाकिस्तान और तुर्की वास्तव में सैन्य रूप से सऊदी के साथ खड़े होंगे?
हालिया घटनाक्रम में दोनों देशों की तरफ से सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं हुआ है। इसी वजह से इस नए रक्षा गठबंधन की प्रभावशीलता पर बहस शुरू हो गई है। हालांकि पाकिस्तान ने संकेत दिया है कि परिस्थितियां बिगड़ने पर समझौते को सक्रिय किया जा सकता है।
दुनिया भर में तेल महंगा होने का खतरा
मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव सिर्फ सऊदी अरब की समस्या नहीं है। अगर तेल की सप्लाई लंबे समय तक बाधित होती है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन, बिजली और महंगाई पर पड़ सकता है। खासकर एशिया और यूरोप जैसे बड़े ऊर्जा आयातक क्षेत्रों के लिए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है।
IEA के अनुसार अगस्त 2026 में सऊदी अरब की वास्तविक कच्चे तेल की सप्लाई करीब 60 लाख बैरल प्रतिदिन तक गिर गई थी, जो तीन दशक से ज्यादा समय में सबसे निचले स्तरों में से एक है। एजेंसी ने इसकी वजह क्षेत्र में जारी हमलों और ऊर्जा ढांचे पर पड़े असर को बताया है।
क्या सऊदी अरब अकेला पड़ रहा है?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी कि सऊदी अरब पूरी तरह अकेला पड़ गया है। उसके पास मजबूत सैन्य क्षमता, अमेरिका समेत कई देशों के साथ सुरक्षा संबंध और बड़े ऊर्जा भंडार हैं। लेकिन एक साथ तेल प्रतिष्ठानों, समुद्री रास्तों और पाइपलाइन पर दबाव उसकी रणनीतिक स्थिति को जरूर मुश्किल बना रहा है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि सऊदी अरब और उसके नए सहयोगी इस बढ़ते खतरे को कितनी जल्दी नियंत्रित कर पाते हैं। अगर संघर्ष लंबा खिंचा और तेल के वैकल्पिक रास्ते भी प्रभावित हुए, तो मिडिल ईस्ट का यह संकट वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए और बड़ा झटका बन सकता है।