हिमालय में ग्लेशियर का टूटना भारत के लिए बड़ा अलर्ट: नेपाल-चीन सीमा की तबाही ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की धड़कन!
नेपाल-चीन सीमा पर हाल में हुई विनाशकारी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) ने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते आपदा जोखिम को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस तरह की घटनाएं भारत के लिए भी बड़ी चेतावनी हैं. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने NDTV से बातचीत में कहा कि यदि भारत के हिमालयी क्षेत्र में कोई बड़ा ग्लेशियर टूटता है या ग्लेशियल झील अचानक फटती है, तो तबाही का पैमाना नेपाल में हुई घटना जितना या उससे भी बड़ा हो सकता है.
विशेषज्ञ के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्र में केवल प्राकृतिक आपदा के खतरे को समझना पर्याप्त नहीं है. यह देखना भी उतना ही जरूरी है कि जोखिम वाले इलाकों में कितनी आबादी रह रही है और वहां किस स्तर पर निर्माण हो चुका है. इसके साथ ही समय रहते लोगों तक खतरे की जानकारी पहुंचाने के लिए प्रभावी अर्ली वॉर्निंग और कम्युनिकेशन सिस्टम विकसित करना भी बेहद जरूरी है.
नेपाल की घटना से भारत को क्या सीखना चाहिए?
डॉ. असवाल ने कहा कि नेपाल-चीन सीमा पर हुई घटना से भारत को कई महत्वपूर्ण सबक लेने की जरूरत है. भारत के पूर्वोत्तर हिमालय से लेकर पश्चिमी हिमालय तक बड़े पैमाने पर ग्लेशियर मौजूद हैं. इनमें से कई ग्लेशियर 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित हैं और उनका आकार तथा बर्फ का भंडार काफी बड़ा है.
ऐसे में अगर किसी बड़े ग्लेशियर में अचानक टूटने की घटना होती है या कोई ग्लेशियल झील फट जाती है, तो उससे निकलने वाला पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर आ सकता है. इसका असर नदी घाटियों और वहां बसे इलाकों पर गंभीर रूप से पड़ सकता है.
हालांकि डॉ. असवाल ने एक महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया. उनके मुताबिक प्राकृतिक खतरा अपने आप में आपदा नहीं होता. वह तब बड़ी आपदा में बदलता है, जब उसके रास्ते में बड़ी आबादी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा मौजूद हो.
नदी के प्राकृतिक रास्ते में निर्माण बन सकता है बड़ा खतरा
नेपाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि नदी किनारे बड़ी संख्या में लोगों के रहने और बुनियादी ढांचे के विकसित होने के कारण नुकसान बढ़ सकता है. कई बार विकास योजनाएं बनाते समय नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र और बाढ़ संभावित इलाकों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता.
नदी के किनारे घर, सड़कें, पुल और दूसरी संरचनाएं बन जाने के बाद अचानक आने वाली बाढ़ का असर कई गुना बढ़ सकता है. डॉ. असवाल ने साफ कहा कि नदियों को अपना प्राकृतिक रास्ता चाहिए होता है, लेकिन इंसानी गतिविधियों के कारण कई जगहों पर उनके बहाव क्षेत्र में लगातार निर्माण हो रहा है.
ऐसे में जरूरत है कि बाढ़ संभावित क्षेत्रों और नदी के प्राकृतिक बहाव वाले इलाकों में निर्माण को लेकर सख्त और वैज्ञानिक नियम बनाए जाएं. विकास जरूरी है, लेकिन उसे प्राकृतिक जोखिमों को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ाना होगा.
हिमालय के लिए नई लैंड यूज प्लानिंग की जरूरत
डॉ. असवाल के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों के लिए वैज्ञानिक आधार पर नई लैंड यूज प्लानिंग नीति तैयार करना समय की जरूरत बन चुका है. पहाड़ी इलाकों में नदियों के आसपास आबादी तेजी से बढ़ी है. इसका एक कारण पानी की उपलब्धता है, जबकि बेहतर सड़क कनेक्टिविटी ने भी नदी घाटियों तक पहुंच आसान कर दी है.
लेकिन जिन क्षेत्रों में पहले कम आबादी थी, वहां अब घर, सड़कें और दूसरी सुविधाएं विकसित हो चुकी हैं. ऐसे में भविष्य की योजना बनाते समय सिर्फ कनेक्टिविटी और विकास को नहीं, बल्कि आपदा के संभावित खतरे को भी प्राथमिकता देनी होगी.
1,000 साल के बाढ़ स्तर का करना होगा आकलन
डॉ. असवाल ने हिमालयी राज्यों में व्यापक रिस्क एनालिसिस की जरूरत पर भी जोर दिया. उन्होंने सुझाव दिया कि नदियों के संभावित अधिकतम बाढ़ स्तर का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए.
इसके तहत यह पता लगाने की कोशिश होनी चाहिए कि पिछले करीब 1,000 वर्षों में किसी नदी में अधिकतम जलस्तर कितना रहा है. अगर इस आधार पर हाईएस्ट फ्लड लेवल की वैज्ञानिक मैपिंग की जाए और उसके मुताबिक सुरक्षित तथा असुरक्षित क्षेत्रों को चिह्नित किया जाए, तो भविष्य में होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है.
ऐसी मैपिंग के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि किन इलाकों में निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए और किन क्षेत्रों को पूरी तरह निर्माण मुक्त रखना जरूरी है. इससे ग्लेशियर टूटने, ग्लेशियल झील फटने, भूस्खलन या अचानक आने वाली बाढ़ के दौरान जान-माल के नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है.
ग्लेशियल झीलों की निगरानी पहले से जारी
भारत में ग्लेशियल झीलों की पहचान और निगरानी के लिए पहले से कई स्तरों पर काम किया जा रहा है. हैदराबाद स्थित National Remote Sensing Centre (NRSC) ने सैटेलाइट की मदद से ग्लेशियल झीलों की मैपिंग की है. केंद्रीय जल आयोग (CWC) भी इस दिशा में निगरानी और अध्ययन कर रहा है.
इसके अलावा अलग-अलग हिमालयी राज्यों की राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियां भी अपने स्तर पर काम कर रही हैं. उत्तराखंड में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने वाडिया इंस्टीट्यूट को ग्लेशियल झीलों की मैपिंग और मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी दी है. हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर में भी ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों की निगरानी के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं की गई हैं.
किन ग्लेशियल झीलों पर सबसे ज्यादा नजर जरूरी?
डॉ. असवाल के मुताबिक सबसे पहले उन ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की पहचान करना जरूरी है, जहां भविष्य में टूटने या झील फटने का खतरा ज्यादा हो सकता है.
वैज्ञानिकों को लगातार यह मॉनिटर करना होगा कि किसी ग्लेशियल झील का आकार कितनी तेजी से बढ़ रहा है. साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि झील को रोकने वाला मोरेन कितना मजबूत है. अगर झील का आकार लगातार बढ़ रहा हो और मोरेन कमजोर होता जा रहा हो, तो यह खतरे का संकेत हो सकता है.
ऐसे संवेदनशील स्थानों पर रियल टाइम या लगातार निगरानी करने वाले आधुनिक तकनीकी सिस्टम लगाए जाने की जरूरत है. इससे संभावित खतरे का पता पहले लगाया जा सकेगा और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकेगा.
Early Warning System को और मजबूत करना होगा
हिमालयी इलाकों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का विस्तार भी बेहद महत्वपूर्ण है. अगर किसी ग्लेशियल झील में अचानक बदलाव आता है, तो इसकी जानकारी जल्द से जल्द नीचे बसे इलाकों तक पहुंचनी चाहिए.
डॉ. असवाल ने आपदा के दौरान कम्युनिकेशन सिस्टम को सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बताया. उनका कहना है कि संकट के समय अगर लोगों तक सही सूचना समय पर पहुंच जाए, तो बड़े पैमाने पर जान बचाई जा सकती है.
नेपाल की घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पानी की रफ्तार बहुत तेज थी. ऐसे में अगर ऊपर से आने वाले खतरे की सूचना नीचे रहने वाले लोगों तक और जल्दी पहुंच पाती, तो संभव है कि नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता था.
भारत ने अर्ली वॉर्निंग और आपदा संचार के क्षेत्र में काफी काम किया है, लेकिन हिमालयी राज्यों में इसे और मजबूत करने की जरूरत है. खासतौर पर उन इलाकों में बेहतर अलर्ट नेटवर्क विकसित करना होगा, जहां ग्लेशियल झीलों या अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा अधिक है.
आपदा प्रबंधन को ब्लॉक स्तर तक ले जाने की तैयारी
डॉ. असवाल ने बताया कि देश के करीब 777 जिलों में जिला आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार की जा चुकी हैं. इन योजनाओं के तहत जिलों में आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया के लिए इमरजेंसी ऑपरेशनल सेंटर की व्यवस्था भी की गई है.
अब जरूरत इस व्यवस्था को ब्लॉक स्तर तक मजबूत करने की है. अगर ब्लॉक स्तर पर भी इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर प्रभावी तरीके से काम करें, तो आपदा के समय सूचना तेजी से नीचे तक पहुंचाई जा सकती है. इससे राहत और बचाव अभियान भी ज्यादा तेजी से शुरू किए जा सकेंगे.
जलवायु बदलाव और बढ़ता विकास दबाव बड़ी चुनौती
हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव, जलवायु जोखिम और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के बीच आने वाले समय में आपदा प्रबंधन को लेकर नई रणनीति बनानी होगी.
सिर्फ आपदा आने के बाद राहत और बचाव अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए पहले से जोखिम वाले इलाकों की पहचान, वैज्ञानिक लैंड यूज प्लानिंग, ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी, मजबूत अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और बेहतर संचार व्यवस्था पर काम करना होगा.
नेपाल में हुई GLOF जैसी घटनाएं भारत के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास की योजना बनाते समय प्राकृतिक जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वैज्ञानिक निगरानी, सुरक्षित निर्माण और समय पर चेतावनी ही भविष्य में संभावित बड़ी हिमालयी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने की सबसे बड़ी कुंजी हो सकती है.