गरीबी दूर करने के लिए कुमारी नाज को बचपन में फिल्मों में करना पड़ा काम, फिल्म के सेट पर सुब्बिराज से की थी शादी
मुंबई, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। बेबी नाज यानी कुमारी नाज हिंदी सिनेमा की उन बाल कलाकारों में थीं, जिन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपनी अदाकारी से देश-विदेश में पहचान बनाई। नाज का असली नाम सलमा बेग था और जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। पिता मिर्जा दाऊद बेग फिल्म लेखक थे। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए बचपन में ही सलमा मंच पर नृत्य प्रस्तुत करने लगी थीं।
एक साक्षात्कार में नाज कुमारी ने बताया था कि उनकी मां उनके साथ शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्व्यवहार करती थीं और उन्हें अपने आराम के लिए काम करने के लिए मजबूर करती थीं।
लगभग आठ साल की उम्र में कुमारी नाज को फिल्म ‘रेशम’ (1952) में काम मिला और उनका नाम सलमा से बदलकर नाज रखा गया। इसके बाद ‘बूट पॉलिश’ (1954) ने उन्हें जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई। फिल्म में उनके अभिनय की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई और 1955 के कान फिल्म फेस्टिवल में उन्हें विशेष सम्मान मिला। बूट पॉलिश में एक बाल कलाकार की भूमिका के लिए सबसे ज्यादा जानी जाने वाली नाज उस समय बॉलीवुड की सबसे अधिक फीस लेने वाली बाल कलाकार थीं।
बेबी नाज ने ‘देवदास’, ‘दो फूल’, ‘कागज के फूल’, ‘गंगा जमुना’, ‘कटी पतंग’, ‘बहू बेगम’ और ‘सच्चा झूठा’ जैसी फिल्मों में काम किया। बाल कलाकार से बड़ी होने के बाद उन्होंने चरित्र भूमिकाएं भी निभाईं। इसी बीच उन्होंने भोजपुरी सिनेमा का रुख किया। साल 1963 में आई 'बिदेसिया' से उन्हें भोजपुरी फिल्मों में भी बड़ी पहचान मिली। इसके बाद 'सैंया से नेहा लगाइबे' और 'अईल बसंत बहार' जैसी फिल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिकाएं निभाईं। इस दौर में वह भोजपुरी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं।
1963 में रिलीज हुई फिल्म 'देखा प्यार तुम्हारा' के डायरेक्टर के. परवेज, हीरो पृथ्वीराज कपूर के भांजे सुब्बिराज और हीरोइन कुमारी नाज थीं। फिल्म की शूटिंग प्रतापगढ़ के एक किले में चल रही थी। फिल्म की शूटिंग के दौरान सुब्बिराज और बेबी नाज काफी घुल-मिल गए थे। धीरे-धीरे यह मुलाकात प्यार में बदल गई। सुब्बिराज को यह मालूम था कि मुंबई जाते ही वह नाज से दूर हो जाएंगे। इन दोनों की शादी के बीच दो अड़चन थीं, पहली अलग-अलग धर्म और दूसरी नाज की आय से ही उनका परिवार चलता था।
सुब्बिराज नाज से दूर नहीं होना चाहते थे। इसलिए एक दिन सुब्बिराज ने शूटिंग के दौरान ही कुमारी नाज की मांग में सिंदूर भरकर उनसे शादी कर ली थी। उस वक्त इस खबर ने फिल्म इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया था। शादी के बाद नाज ने हिंदू धर्म अपना लिया और अपना नाम बदलकर "अनुराधा" रख लिया। जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने फिल्मों से दूरी बनाई और डबिंग का काम भी किया। 19 अक्टूबर 1995 को 51 वर्ष की उम्र में मुंबई में उनका निधन हुआ।
श्रीदेवी जब हिंदी फिल्मों में अपनी पहचान बना रही थीं, उस समय कुमारी नाज ने उनकी शुरुआती हिंदी फिल्मों के लिए आवाज दी। कई रिपोर्ट्स में खास तौर पर 'हिम्मतवाला', 'मवाली' और 'तोहफा' का जिक्र है। पर्दे पर श्रीदेवी नजर आती थीं लेकिन परदे के पीछे आवाज नाज की होती थी।
--आईएएनएस
ओपी/पीएम