मिट्टी, मेहनत और पहचान : गांवों से निकलकर दुनिया को अपनी कहानी सुना रहे पश्चिमी भारत के 'जीआई' उत्पाद
नई दिल्ली, 25 मई (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान के बाद से देश में जीआई टैग (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है। उनका मानना है कि हर क्षेत्र की खास कला, परंपरा और उत्पादों को दुनिया में पहचान मिलनी चाहिए। जीआई टैग स्थानीय उत्पादों को नई पहचान और बाजार दिलाने में मदद कर रहा है।
भारत के कई स्थानीय उत्पाद सदियों से गांवों और छोटे कस्बों में तैयार होते आ रहे हैं। पश्चिमी भारत के महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और दमन-दीव जैसे क्षेत्रों में ऐसे कई उत्पाद हैं, जिन्होंने अपनी गुणवत्ता, कला और परंपरा के दम पर देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खास जगह बनाई है। इन उत्पादों को मिला जीआई टैग यानी जियोग्राफिकल इंडिकेशन प्रमाणपत्र उनकी मौलिकता और विशेषता की पहचान बन चुका है।
जीआई टैग किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ता है। इसका मतलब है कि उस वस्तु की खास गुणवत्ता, स्वाद या कला उसी क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और पारंपरिक तकनीक से जुड़ी होती है। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है और स्थानीय किसानों, बुनकरों तथा कारीगरों को आर्थिक लाभ मिलता है।
पश्चिमी भारत के ये जीआई उत्पाद केवल व्यापार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक भी हैं। इन उत्पादों की बढ़ती मांग से गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। किसान, बुनकर, कारीगर और छोटे व्यवसायी अब अपनी कला और मेहनत का बेहतर मूल्य प्राप्त कर रहे हैं।
आज जब पूरी दुनिया प्राकृतिक, पारंपरिक और हस्तनिर्मित उत्पादों की ओर आकर्षित हो रही है, तब पश्चिम भारत के जीआई उत्पाद भारत की सांस्कृतिक शक्ति को नई ऊंचाई दे रहे हैं। गांवों की मिट्टी से निकली यह पहचान अब वैश्विक बाजार में भारत का गौरव बन चुकी है।
महाराष्ट्र के जीआई उत्पाद आज दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय हैं। रत्नागिरी का अल्फांसो आम अपनी मिठास और सुगंध के लिए विशेष पहचान रखता है। गर्मियों के मौसम में इसकी मांग विदेशों तक रहती है। इसी तरह नासिक के अंगूर और नागपुर का संतरा भी अपनी गुणवत्ता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में पसंद किए जाते हैं। महाबलेश्वर की स्ट्रॉबेरी का स्वाद और ताजगी इसे खास बनाते हैं। सांगली की किशमिश और कोल्हापुर का गुड़ भी अपनी पारंपरिक गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं।
खेती के साथ-साथ महाराष्ट्र की कला और हस्तशिल्प भी जीआई टैग के जरिए नई पहचान पा चुके हैं। पैठण की प्रसिद्ध पैठानी साड़ी अपनी महीन बुनाई और पारंपरिक डिजाइन के लिए जानी जाती है। वहीं कोल्हापुरी चप्पल भारतीय हस्तकला का शानदार उदाहरण है, जिसे देश-विदेश में पसंद किया जाता है। सोलापुर की चादर और टेरी तौलिया भी अपनी मजबूती और आरामदायक कपड़े के लिए मशहूर हैं। पुणेरी पगड़ी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक शान मानी जाती है।
महाराष्ट्र की वारली पेंटिंग्स आदिवासी कला का अनोखा रूप हैं। इन चित्रों में गांव के जीवन, खेती, त्योहार और प्रकृति को बेहद सरल रेखाओं में दर्शाया जाता है। मिट्टी की दीवारों पर सफेद रंग से बनाई जाने वाली यह कला आज आधुनिक कला प्रेमियों को भी आकर्षित कर रही है।
गुजरात भी जीआई उत्पादों की समृद्ध परंपरा वाला राज्य है। यहां की कच्छ एंब्रॉयडरी अपनी रंगीन कढ़ाई और पारंपरिक डिजाइन के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। पाटन पटोला साड़ी को भारत की सबसे उत्कृष्ट हस्तनिर्मित साड़ियों में गिना जाता है। इसे तैयार करने में महीनों का समय लगता है। जामनगर की बंधानी कला और राजकोट पटोला भी गुजरात की पारंपरिक कला को नई पहचान देते हैं।
गुजरात के कृषि उत्पादों में गिर केसर आम और भालिया गेहूं विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। गिर केसर आम अपनी मिठास और केसर जैसे रंग के कारण लोगों की पहली पसंद बन चुका है। वहीं, भालिया गेहूं की गुणवत्ता और पोषण इसे खास बनाते हैं। कच्छ का अजरख प्रिंट और माता नी पछेड़ी जैसी पारंपरिक कलाएं भी राज्य की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करती हैं।
गोवा को आमतौर पर पर्यटन और समुद्र तटों के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां के पारंपरिक उत्पाद भी अपनी अलग पहचान रखते हैं। गोवा का काजू और उससे बने उत्पाद दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। गोवा फेनी, जो काजू सेब से बनाई जाती है, राज्य की पारंपरिक पेय संस्कृति का हिस्सा है। गोवा का कोरगुट चावल और स्थानीय आम की किस्में भी अपनी गुणवत्ता के कारण खास मानी जाती हैं।
गोवा की मिठाइयों और खाद्य उत्पादों में बेबिनका और गोअन खाजे जैसी पारंपरिक चीजें लोगों को बेहद पसंद आती हैं। हरमल मिर्च और खोआ मिर्च जैसे उत्पाद स्थानीय स्वाद को नई पहचान देते हैं। इन उत्पादों ने छोटे किसानों और स्थानीय उद्यमियों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराया है।
दमन, दीव और दादरा-नगर हवेली की वारली चित्रकला भी पश्चिम भारत की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है। यह कला आदिवासी जीवन को बेहद सरल तरीके से दुनिया के सामने पेश करती है। इसमें चमकीले रंगों की जगह सफेद रंग का उपयोग किया जाता है और चित्र मिट्टी तथा गोबर से तैयार पृष्ठभूमि पर बनाए जाते हैं। इन चित्रों में गांव का जीवन, खेती, पशु, नृत्य और प्रकृति की झलक दिखाई देती है। आज यह कला अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों तक पहुंच चुकी है।
--आईएएनएस
एमटी/एएस