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गायकी से मचा दिया था धूम; आज भी अनसुलझी है मौत की पहेली, कौन थे मास्टर मदन?

 

नई दिल्ली, 4 जून (आईएएनएस)। गजल और गीत गायकी के कलाकार मास्टर मदन का 5 जून 1942 को केवल 14 वर्ष की छोटी उम्र में रहस्यमयी तरीके से निधन हो गया था। संगीत की दुनिया में उन्होंने अपनी कलाकारी से धूम मचा दिया था। उनकी मौत आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है। ईर्ष्या, प्रतिद्वंद्विता और संभवतः जहर की आशंका ने एक प्रतिभा को कुचल दिया था।

बता दें कि मदन सिंह का जन्म 28 दिसंबर 1927 को पंजाब के खानखाना गांव (शहीद भगत सिंह नगर) में एक साधारण सिख परिवार में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह और माता पूरन देवी के घर जन्मे मदन में बचपन से ही संगीत की प्रतिभा झलक रही थी। मात्र ढाई-तीन वर्ष की उम्र में उन्होंने गाना शुरू किया और जल्द ही पूरे भारत में धूम मचा दी।

शिमला, दिल्ली, लाहौर, अंबाला समेत कई शहरों में उनके कार्यक्रमों में भारी भीड़ उमड़ने लगी थी। महज आठ गाने रिकॉर्ड कराने वाले मास्टर मदन की गजलें जैसे 'यूं न रह रह कर हमें तरसाइए' और 'हैरत से तक रहा है जहां-ए-वफा मुझे' आज भी लोगों के दिलों पर छपी हुई है। उनकी आवाज में शास्त्रीय गहराई, गजल की नजाकत और लोक की मिठास का अनोखा संगम था।

वर्ष 1942 में मास्टर मदन ने कोलकत्ता में एक स्टेज परफॉर्मेंस दी। इसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए गाना जारी रखा लेकिन इसी दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। कई रिपोर्ट्स हैं कि उन्हें किसी ने दूध में पारा घोलकर पिला दिया था। कुछ ही दिनों बाद 5 जून 1942 को उनका निधन हो गया। उनकी मौत आज भी अनसुलझी पहेली बनी हुई है।

उनकी मौत ने सबको को झकझोर दिया था। उन्हें उनके सारे स्वर्ण पदकों सहित समाधि दी गई। उनकी मां पूरन देवी भी कुछ समय बाद इस सदमे से टूटकर चल बसीं। मात्र 14 वर्ष 5 महीने में उनके चले जाने से संगीत जगत सन्न रह गया था।

मास्टर मदन के आठ रिकॉर्डेड गीतों में हर स्वर आज भी भावुक कर देता है। संगीतकारों का मानना है कि अगर मास्टर मदन जीवित रहते तो वे उस्ताद अमीर खां या बड़े गुलाम अली खां जैसे महान गायकों की कतार में खड़े होते।

--आईएएनएस

एसडी/पीएम