उमर खालिद और शरजील इमाम पर आरोप सिद्ध नहीं, समर्थन में नारे लगाना गैरकानूनी नहीं : सैयद कासिम रसूल इलियास
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर (आईएएनएस)। जामियामिल्लिया इस्लामिया में लगाए गए 'फ्री उमर खालिद' और 'फ्री शरजील इमाम' नारों को लेकर उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि इसमें कोई खराबी नहीं है। उन्होंने कहा कि न तो उमर खालिद पर और न ही शरजील इमाम पर अभी तक कोर्ट में कोई आरोप सिद्ध हुआ है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और इसमें कानूनी रूप से कुछ भी गलत नहीं है।
उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, "छात्राओं को भी छात्रसंघ में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उन्हें भी समान अधिकार हैं। चाहे छात्र हों या छात्राएं, दोनों को छात्रसंघ में भाग लेने, चुनाव लड़ने, प्रतिस्पर्धा करने, निर्वाचित होने और निर्वाचित होने के बाद छात्रों का प्रतिनिधित्व करने का समान अधिकार है।"
उन्होंने कहा कि छात्र और छात्रा दोनों बराबर हैं और उनके अधिकार भी समान हैं। लड़के और लड़की के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। यदि कोई छात्रा उपाध्यक्ष या अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार बनती है तो इसमें किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सभी को समान अवसर और समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए।
मुस्लिम लड़कियों की राजनीति में बढ़ती भागीदारी को लेकर रसूल इलियास ने कहा कि असल में हमारे देश में राजनीति के अंदर चाहे पुरुष हो या महिला, दोनों को बराबर अधिकार हैं कि वे राजनीति में हिस्सेदारी लें और शामिल हों। अफसोस इस बात का है कि हमारी संसद में 33 फीसदी आरक्षण की बात कही गई, लेकिन अब तक वह पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। हम समझते हैं कि अगर छात्र संघ के अंदर छात्राओं की भागीदारी बढ़ रही है तो यह अच्छा संकेत है। कम्युनिटी के लिए भी अच्छा संकेत है कि उनकी लड़कियां सशक्त हो रही हैं, आगे बढ़ रही हैं और अपनी पहचान के साथ सामने आ रही हैं। इसलिए हमें कोई ऐतराज नहीं है।
बुर्के को लेकर छिड़ी बहस पर उन्होंने कहा कि हमारे देश में यह कोई मुद्दा नहीं है। पिछले दिनों कर्नाटक में यह मामला उठा था, लेकिन वहां स्कूलों की यूनिफॉर्म को लेकर चर्चा थी। अगर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्राएं बुर्का या हिजाब पहनकर जाती हैं और अपना पूरा शरीर ढकती हैं तो उसमें क्या ऐतराज है? कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगर वे अपनी पहचान, अपने बुर्के और अपने हिजाब के साथ पढ़ाई करती हैं और फिर चुनाव भी लड़ती हैं, तो हमें कोई ऐतराज नहीं है। बिल्कुल सही है। जब यह कहा जाता है कि "मेरा जिस्म, मेरी मर्जी", तो अगर मुस्लिम छात्राएं अपने शरीर को ढकना चाहती हैं, अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मानकों के अनुसार शालीन वस्त्र पहनना चाहती हैं, तो उस पर भी कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।
उमर खालिद के पिता ने कहा कि दूसरे देशों में जहां इस तरह के विवाद हुए हैं, वहां मुख्य विवाद यह नहीं है कि महिलाएं हिजाब पहनें या न पहनें। सवाल यह रहा है कि वे चेहरा ढकेंगी या नहीं। इस्लाम के अंदर इस संबंध में अलग-अलग मत मौजूद हैं। कुछ लोग मानते हैं कि पर्दे में चेहरा भी शामिल है, जबकि कुछ लोग मानते हैं कि पर्दे में चेहरा शामिल नहीं है। दोनों तरह की परंपराएं मुस्लिम समाज में मौजूद हैं। कुछ लड़कियां चेहरा भी ढकती हैं और कुछ नहीं ढकती हैं।
उन्होंने कहा कि मैं समझता हूं कि बुर्के पर प्रतिबंध लगाने की मांग गलत है। यदि सुरक्षा का मुद्दा है, तो उसके लिए अलग व्यवस्था की जा सकती है। हमारे यहां आज भी एयरपोर्ट या अन्य संवेदनशील स्थानों पर जहां सुरक्षा का प्रश्न होता है, वहां महिलाओं की जांच महिला कर्मियों द्वारा अलग कक्ष में की जाती है। इसलिए यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। फ्रांस जैसे देशों में जो विवाद खड़े हुए, वे उचित नहीं हैं। अगर कोई महिला यह कहती है कि वह गैर-महरम पुरुषों के सामने अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहती, तो उसे यह आजादी मिलनी चाहिए। यह उसका अधिकार है। यदि सुरक्षा का प्रश्न है, तो महिला पुलिसकर्मी या महिला कर्मचारी उसकी पहचान सत्यापित कर सकती हैं।
सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि यह किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है कि वह बेल की मांग करे या किसी की रिहाई की मांग उठाए। जब बड़े-बड़े मामलों में आरोप सिद्ध होने के बाद भी लोगों को बेल मिल जाती है, तो उमर खालिद और शरजील इमाम के मामलों में, जहां अभी आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं, यदि कोई उनके समर्थन में नारे लगाता है तो उसमें क्या आपत्ति है?
उन्होंने कहा कि यह कोई गैरकानूनी काम नहीं है। अगर कोई लिखता है "फ्री उमर खालिद" या "फ्री शरजील इमाम" तो इसमें संवैधानिक या कानूनी रूप से क्या गलत है? अगर ये विश्वविद्यालय के छात्र हैं और विश्वविद्यालय के अन्य छात्र यह कहते हैं कि उनके साथियों को बेल मिलनी चाहिए, तो यह उनकी राय व्यक्त करने का तरीका है।
--आईएएनएस
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