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यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी में चुने गए आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप

 

नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। विज्ञान की दुनिया में भारत के लिए एक और बड़ी उपलब्धि सामने आई है। आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप को स्वीडन के गोथेनबर्ग स्थित यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी का पूर्ण सदस्य चुना गया है। उन्हें नैनो विज्ञान, जल शुद्धिकरण और कम लागत वाली स्वच्छ पेयजल तकनीकों के क्षेत्र में उनके अग्रणी योगदान के लिए यह सम्मान मिला है।

प्रो. थलप्पिल प्रदीप को विज्ञान के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री व विज्ञान श्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हैं। यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को एक मंच पर लाती है। इसके सदस्यों में कई नोबेल पुरस्कार, फील्ड्स पदक और ट्यूरिंग पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक भी शामिल हैं। अकादमी का गठन 1992 में हुआ था। इसका उद्देश्य विज्ञान और इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नीतियों के निर्माण में विशेषज्ञ सलाह उपलब्ध कराना है।

खास बात यह है कि आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर, इस अकादमी के पूर्ण सदस्य बनने वाले तीसरे भारतीय वैज्ञानिक हैं। उनसे पहले भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. सी. एन. आर. राव और प्रो. बिमन बागची इस अकादमी के सदस्य चुने जा चुके हैं। इस प्रतिष्ठित अकादमी में यूरोप और अमेरिका में काम कर रहे भारतीय मूल के कई वैज्ञानिक भी शामिल हैं।

आईआईटी मद्रास का कहना है कि प्रो. प्रदीप का वैज्ञानिक काम केवल प्रयोगशालाओं और शोध पत्रों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने नैनो तकनीक की मदद से किफायती जल शुद्धिकरण तकनीक विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस तकनीक का इस्तेमाल भारत में लोगों को आर्सेनिक और कीटनाशकों जैसे खतरनाक प्रदूषकों से मुक्त सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए किया गया। उनका शोध इस बात का उदाहरण है कि अत्याधुनिक विज्ञान को अगर सही तरीके से जमीन पर उतारा जाए, तो वह आम लोगों के जीवन में सीधा बदलाव ला सकता है।

प्रो. थलप्पिल प्रदीप नैनो पदार्थों, आणविक प्रणालियों और कम लागत वाली तकनीकों के विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाते हैं। उनके शोध ने मौलिक नैनो विज्ञान को ऐसी उपयोगी तकनीकों से जोड़ा, जिन्हें बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सके। उनके शोध का एक प्रमुख लक्ष्य दुनिया की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक, हर व्यक्ति तक सुरक्षित पेयजल पहुँचाने, का वैज्ञानिक समाधान तलाशना रहा है।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्वच्छ जल केंद्र की भी स्थापना की है। यह केंद्र प्रयोगशालाओं में होने वाली वैज्ञानिक खोजों को ऐसी तकनीकों में बदलने की दिशा में काम करता है, जिनसे भविष्य में जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि ने प्रो. प्रदीप को बधाई देते हुए कहा कि नैनो विज्ञान और स्वच्छ जल तकनीक को बड़े पैमाने पर किफायती इंजीनियरिंग समाधानों में बदलना भारत जैसे बड़े देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि प्रो. प्रदीप का इन क्षेत्रों में योगदान बेहद महत्वपूर्ण है और संस्थान को इस अंतरराष्ट्रीय सम्मान पर गर्व है।

वहीं इस उपलब्धि पर प्रो. थलप्पिल प्रदीप ने कहा कि यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी के लिए चुना जाना उनके लिए बेहद सम्मान की बात है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन्हें ऐसे नए वैज्ञानिक शोध करने के लिए और मजबूत संकल्प देता है, जो वास्तविक सामाजिक समस्याओं का समाधान कर सकें। उन्होंने इसे वैश्विक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की बढ़ती पहचान और नेतृत्व क्षमता का भी प्रतिबिंब बताया।

गौरतलब है कि प्रो. प्रदीप का वैज्ञानिक शोध केवल पानी साफ करने तक सीमित नहीं है। उनका काम नैनो पदार्थों, सूक्ष्म बूंदों, बर्फ रसायन, आणविक समूहों, सतहों और स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसे कई क्षेत्रों तक फैला हुआ है। यूरोपीय इंजीनियरिंग अकादमी में चुनाव से ठीक पहले प्रो. प्रदीप को अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन के जे. सी. बोस अनुदान के लिए भी चुना गया था। यह वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए भारत के प्रतिष्ठित शोध सम्मानों में शामिल है। यह उनका जे. सी. बोस सम्मान के तहत तीसरा पांच वर्षीय कार्यकाल है। पहले इसे जे. सी. बोस फेलोशिप के नाम से जाना जाता था।

--आईएएनएस

जीसीबी/एसके