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दुर्गा पूजा में कैसे सजता है बंगाल? जानिए क्यों लाल-पाड़ वाली सफेद साड़ी है खास

 

कोलकाता, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। दुर्गा पूजा आते ही पश्चिम बंगाल, खासकर कोलकाता, रोशनी, कला, सजावट और धार्मिक उत्सव के रंग में रंग जाता है। शहर की गलियों से लेकर बड़े चौराहों तक पंडाल, रोशनी और अलग-अलग तरह की सजावट लोगों का ध्यान खींचती है। इस दौरान पारंपरिक परिधान भी उत्सव का खास हिस्सा बन जाते हैं।

दुर्गा पूजा के दौरान अलग-अलग इलाकों में अस्थायी पंडाल तैयार किए जाते हैं। इनकी सजावट कई बार ऐतिहासिक इमारतों, मंदिरों या सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों की थीम पर आधारित होती है। पारंपरिक बंगाली संस्कृति से लेकर अलग-अलग कलात्मक विषयों को पंडाल की सजावट में जगह दी जाती है। पंडालों के साथ-साथ आसपास के इलाकों को भी रोशनी से सजाया जाता है। गलियों और प्रमुख स्थानों पर रंग-बिरंगी लाइटें, झांकियां और आधुनिक तकनीक से तैयार की गई सजावट देखने को मिलती है।

दुर्गा पूजा की तैयारियों में महालया का विशेष महत्व है। इस अवसर से जुड़ी परंपराओं में देवी दुर्गा की प्रतिमा की आंखें बनाने की रस्म को चक्षु दान कहा जाता है। दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण में मिट्टी के साथ बांस और कपड़े जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल भी पारंपरिक रूप से किया जाता है। पूजा के दिनों में लोग नए कपड़े पहनकर अलग-अलग पंडालों में जाते हैं। रात के समय पंडालों को देखने निकलने की यह परंपरा दुर्गा पूजा के सार्वजनिक उत्सव का प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। दुर्गा पूजा की परंपराओं में धनुची नृत्य का भी खास स्थान है। संध्या आरती के दौरान धुनुची के साथ यह पारंपरिक नृत्य किया जाता है।

वहीं, विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई से पहले महिलाओं के बीच सिंदूर खेला की परंपरा देखने को मिलती है। इस दौरान महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद प्रतिमा विसर्जन के साथ दुर्गा पूजा का समापन होता है।

दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली महिलाओं के पारंपरिक परिधानों में सफेद साड़ी और लाल बॉर्डर वाली साड़ी, जिसे आम तौर पर लाल-पाड़ साड़ी कहा जाता है, खास तौर पर नजर आती है। यह बंगाली पारंपरिक पहनावे की पहचान से जुड़ी साड़ी है। लाल-पाड़ साड़ी कपास और रेशम जैसे कपड़ों में तैयार की जाती रही है। बंगाल में तांत जैसी पारंपरिक साड़ियों की अपनी अलग पहचान है। दुर्गा पूजा जैसे अवसरों पर लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनने की परंपरा सांस्कृतिक और धार्मिक वातावरण से जुड़ती है।

इस साड़ी के दोनों रंगों को लेकर भी पारंपरिक मान्यताएं हैं। लाल रंग को शक्ति और ऊर्जा से जोड़ा जाता है, जबकि सफेद रंग को पवित्रता से संबंधित माना जाता है। यही वजह है कि लाल और सफेद रंगों वाली साड़ी दुर्गा पूजा के अवसर पर विशेष रूप से पसंद की जाती है। हालांकि, इसे सभी बंगाली महिलाओं के लिए अनिवार्य परिधान मानना सही नहीं होगा। लाल-पाड़ साड़ी का पारंपरिक बंगाली ड्रेपिंग स्टाइल भी इसे अलग पहचान देता है। इसमें पल्लू और बॉर्डर को इस तरह रखा जाता है कि साड़ी का लाल किनारा स्पष्ट दिखाई दे।

पारंपरिक बंगाली लुक में गहनों की भी अहम भूमिका होती है। सोने के हार, झुमके, चूड़ियां और पारंपरिक डिजाइन वाले आभूषण साड़ी के साथ पहने जाते हैं। इससे दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली पारंपरिक परिधान का स्वरूप और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

--आईएएनएस

पीएसके/डीकेपी