दीनानाथ मंगेशकर: पांच साल की उम्र में संगीत की शुरुआत, नाटकों में निभाते थे महिला पात्रों का किरदार
मुंबई, 23 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय संगीत जगत में मंगेशकर परिवार का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। इस गौरवशाली परंपरा की मजबूत नींव पंडित दीनानाथ मंगेशकर ने रखी, जिन्होंने बेहद कम उम्र में संगीत की दुनिया में कदम रखा और आगे चलकर मराठी रंगमंच और संगीत नाटक के प्रमुख स्तंभ बन गए।
दीनानाथ मंगेशकर केवल एक गायक नहीं, बल्कि एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने कम उम्र से ही अपनी प्रतिभा के दम पर पहचान बनाई। पांच साल की उम्र में शुरू हुआ उनका सफर भारतीय संगीत और रंगमंच के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
उनका जन्म 29 दिसंबर 1900 को गोवा के मंगेशी गांव में हुआ था। उनका परिवार धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण से जुड़ा हुआ था। उनके पिता मंदिर में पुजारी थे, जबकि उनकी मां भजन गाकर भगवान की सेवा करती थीं। मां से ही उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा मिली, जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी।
बताया जाता है कि दीनानाथ ने महज पांच साल की उम्र में ही संगीत की औपचारिक शिक्षा लेना शुरू कर दिया था। इतनी छोटी उम्र में ही सुर और ताल पर उनकी पकड़ देखकर लोग हैरान रह जाते थे। उन्होंने आगे चलकर कई प्रसिद्ध गुरुओं से प्रशिक्षण लिया और संगीत को केवल सीखा ही नहीं, बल्कि पूरी तरह आत्मसात किया। कम उम्र में ही उनका रुझान मराठी रंगमंच की ओर बढ़ा। उन्होंने किर्लोस्कर नाटक मंडली से जुड़कर अपने अभिनय और गायन का प्रदर्शन शुरू किया। उस समय रंगमंच पर महिला कलाकारों की कमी होती थी, इसलिए पुरुष कलाकार ही स्त्री पात्र निभाते थे। दीनानाथ मंगेशकर ने भी कई नाटकों में महिला भूमिकाएं निभाईं और अपनी सशक्त आवाज और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया।
उनकी मंच पर उपस्थिति इतनी दमदार थी कि वह कम समय में ही लोकप्रिय हो गए। अभिनय के साथ-साथ उनका गायन भी दर्शकों को खूब पसंद आता था। उन्होंने उर्दू और हिंदी नाटकों में भी काम किया और हर भूमिका को पूरी ईमानदारी से निभाया।
साल 1918 में दीनानाथ मंगेशकर ने अपनी खुद की ‘बलवंत संगीत नाटक मंडली’ की स्थापना की। इस मंडली के माध्यम से उन्होंने कई ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों पर आधारित नाटकों का मंचन किया। उनके प्रस्तुत किए गए नाटक दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुए और उनकी पहचान एक कुशल कलाकार के रूप में और मजबूत हुई।
रंगमंच के साथ-साथ उन्होंने सिनेमा की दुनिया में भी कदम रखा। 1930 के दशक में उन्होंने कुछ फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ खास तौर पर चर्चा में रही। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय करने के साथ-साथ अपने गीत भी गाए, जिससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा सामने आई।
उनका निजी जीवन भी कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा। उन्होंने दो बार विवाह किया और अपने परिवार को संभालते हुए कला के क्षेत्र में निरंतर योगदान दिया। उनकी संतानें आगे चलकर भारतीय संगीत जगत की पहचान बनीं। उनकी बेटी लता मंगेशकर, आशा भोसले, उषा मंगेशकर और बेटे हृदयनाथ मंगेशकर ने संगीत की दुनिया में नई ऊंचाइयां हासिल कीं।
दीनानाथ मंगेशकर ने अपने बच्चों को भी संगीत के प्रति समर्पण और अनुशासन का पाठ पढ़ाया। यही कारण है कि उनके परिवार ने भारतीय संगीत को नई दिशा दी।
दुर्भाग्यवश, 24 अप्रैल 1942 को मात्र 41 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हालांकि उनका जीवन छोटा रहा, लेकिन उनकी उपलब्धियां और योगदान आज भी याद किए जाते हैं।
--आईएएनएस
एमटी/डीकेपी