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नई दिल्ली : अंबेडकर यूनिवर्सिटी के कश्मीरी गेट कैंपस में दिखीं पार्टीशन म्यूजियम की झलकियां

 

नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के अवसर पर दिल्ली के अंबेडकर यूनिवर्सिटी के कश्मीरी गेट कैंपस में पार्टीशन म्यूजियम की झलकियां प्रदर्शित की गईं। इस प्रदर्शनी के जरिए भारत के विभाजन से जुड़ी कहानियों, विस्थापन के दर्द और उन लोगों के निजी अनुभवों को सामने लाया गया, जिन्होंने बंटवारे की त्रासदी को प्रत्यक्ष या अपने परिवारों की स्मृतियों के जरिए महसूस किया।

कार्यक्रम के दौरान लक्ष्मी पुरी, किश्वर देसाई और बंटवारे से प्रभावित परिवार के सदस्यों ने विभाजन की यादों और उससे जुड़ी पीढ़ियों की विरासत पर अपने विचार साझा किए। प्रभावित परिवार के सदस्यों ने कहा कि विभाजन केवल इतिहास की किताबों में दर्ज एक घटना नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों के जीवन, उनकी स्मृतियों और उनके संघर्षों से जुड़ा अनुभव है।

कर्नल अनिल भाटिया ने अपने दादा डॉ. ईशा दास भाटिया की भूमिका के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि उनके दादा अमृतसर में सर्जन थे और जलियांवाला बाग की घटना के बाद उन्होंने बड़ी संख्या में घायलों का इलाज किया था। भाटिया ने बताया कि उनके दादा ने उस रात लालटेन की रोशनी में कई घायलों का ऑपरेशन किया और उनके शरीर से गोलियां निकालीं। इलाज के दौरान निकाली गई गोलियों और घायलों से जुड़ी जानकारियों को प्रमाण के तौर पर दर्ज किया गया था।

उन्होंने कहा कि उनके दादा ने घायलों के नामों से संबंधित रजिस्टर और सूचियां ब्रिटिश अधिकारियों को सबूत के तौर पर उपलब्ध कराई थीं, लेकिन वे दस्तावेज बाद में वापस नहीं मिले। बाद में निकाली गई गोलियों को कांग्रेस समिति, लाहौर को भी सौंपा गया था। उन्होंने आगे कहा कि उस समय पंजाब में कर्फ्यू लगा हुआ था और इसके बावजूद उनके दादा उन गोलियों को लेकर गए और संबंधित लोगों को सौंपा। इस मामले की जांच में संभवतः मदन मोहन मालवीय की भूमिका रही थी।

जगमोहन भारद्वाज ने भी परिवार के विभाजन के दौरान हुए विस्थापन की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि उनका परिवार शेखपुरा जिले के एक छोटे से गांव कलसारा से विस्थापित होकर भारत आया था। उन्होंने कहा कि उस समय वह बहुत छोटे थे, इसलिए उन्हें स्वयं उस दौर की ज्यादा बातें याद नहीं हैं। हालांकि, परिवार के बुजुर्गों से सुनी कहानियों के जरिए उन्हें अपने परिवार के संघर्ष और भारत आने की पूरी यात्रा के बारे में जानकारी मिली।

उन्होंने बताया कि उनके परिवार ने रावी नदी को पार कर भारतीय सीमा में प्रवेश किया। उनका गांव रावी नदी से बहुत दूर नहीं था। भारत पहुंचने के बाद परिवार ने अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू किया और विस्थापन के दर्द के बावजूद आगे बढ़ने की कोशिश की। उन्होंने यह भी कहा कि विभाजन की त्रासदी से गुजरने वाले लोगों की भूमिका को याद करना जरूरी है। आज यह जानकर उन्हें बहुत अच्छा लगा कि शरणार्थियों को भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देखा और याद किया जा रहा है।

--आईएएनएस

पीएसके/एबीएम