दिल्ली शब्दोत्सव 2026 : साहित्य, विचार और संवाद का आयोजन भारत को वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाएगा- शिवेश प्रताप
नई दिल्ली, 2 जनवरी (आईएएनएस)। ‘पंच परिवर्तन’ पुस्तक के लेखक शिवेश प्रताप ने दिल्ली में आयोजित शब्दोत्सव 2026 के दौरान अपनी पुस्तक और इसके विचारों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि ‘पंच परिवर्तन’ के अंतर्गत देश में पांच मूलभूत और व्यापक परिवर्तन लाने की परिकल्पना की गई है, जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि साहित्य, विचार और संवाद के माध्यम से यह आयोजन समाज को जागरूक करने और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मजबूत करने का कार्य करेगा।
आईएएनएस से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह पुस्तक विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर प्रस्तुत किए गए ‘शताब्दी सोपान’ के विचारों से जुड़ी हुई है। संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिए गए संदेश के अनुसार, संघ समाज के बीच ‘पंच परिवर्तन’ का विचार लेकर जा रहा है, जिसका उद्देश्य देश में व्यापक और सकारात्मक बदलाव लाना है।
शिवेश प्रताप ने बताया कि ‘पंच परिवर्तन’ के अंतर्गत देश में पांच मूलभूत और व्यापक परिवर्तन लाने की परिकल्पना की गई है, जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इन पांच विषयों में स्व यानी आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन विषयों की पहचान कर स्वयंसेवक समाज और लोकजीवन के बीच जाकर कार्य करेंगे। जब देश का प्रत्येक नागरिक ‘पंच परिवर्तन’ के इन मूल विचारों में अपना योगदान देगा, तो भारत स्वाभाविक रूप से विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ेगा।
दिल्ली शब्दोत्सव 2026 के बोधवाक्य पर चर्चा करते हुए शिवेश प्रताप ने कहा कि इस आयोजन का सूत्रवाक्य ‘वादे वादे जायते तत्वबोधः’ की अगली पंक्ति ‘बोधे बोधे भासते चंद्रचूड़ः’ है। उन्होंने इसके अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि हर वाद से तत्वबोध उत्पन्न होता है और हर बोध से चंद्रचूड़, अर्थात शिव की प्राप्ति होती है। यह विचार भारतीय दर्शन के उस मूल संदेश की ओर संकेत करता है, जिसमें सत्य से शिव और शिव से सुंदर की ओर बढ़ने की अवधारणा निहित है। उनके अनुसार, दिल्ली शब्दोत्सव 2026 अपनी राष्ट्रवादी चेतना, विचारधारा और साहित्य के माध्यम से इसी मार्ग को आगे बढ़ाने का प्रयास करेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि शब्दोत्सव का यह प्रयास भारत को वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाकर एक परम वैभवशाली राष्ट्र में परिवर्तित करने की दिशा में योगदान देगा। साहित्य, विचार और संवाद के माध्यम से यह आयोजन समाज को जागरूक करने और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मजबूत करने का कार्य करेगा।
सामाजिक समरसता के विषय पर संघ के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए शिवेश प्रताप ने कहा कि किसी भी समरस समाज से ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत ही विश्व कल्याण का आधार बन सकता है। जब भारत के भीतर सामाजिक समरसता मजबूत होगी, तो पड़ोसी देशों को भी यह बोध होगा कि वे भी भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उनका मानना है कि सामाजिक समरसता का यह मंत्र जब वैश्विक स्तर पर पहुंचेगा, तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना और अधिक प्रबल होगी, जिससे पूरी दुनिया में शांति, सहयोग और सौहार्द का वातावरण बनेगा।
--आईएएनएस
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