'दिल्ली में पुलिस ने निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया', शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' में केंद्र सरकार की निंदा की
मुंबई, 13 अक्टूबर (आईएएनएस)। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से मुखपत्र 'सामना' में मंगलवार को केंद्र सरकार पर दिल्ली में आंदोलन कर रहे लोगों पर लाठियां चलाने का आरोप लगाया गया है। शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र में लिखा गया, "दिल्ली और मुंबई की पुलिस बेकाबू होकर आंदोलनकारियों की पिटाई कर रही है।"
शिवसेना (यूबीटी) ने 'सामना' में कहा, "बिना किसी कारण के आंदोलनकारियों पर लाठियां मत चलाओ, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद दिल्ली और मुंबई की पुलिस बेकाबू होकर आंदोलनकारियों की पिटाई कर रही है। लोगों के एकत्र होने और शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है लेकिन सत्याग्रहियों के विरुद्ध भारी बल प्रयोग करना शुरू कर दिया गया है।"
'सामना' में आरोप लगाया गया है, "दिल्ली में महिला सत्याग्रहियों और महिला पत्रकारों के साथ पुलिस ने निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया। पुरुष पुलिसकर्मियों ने उनके शरीर के साथ छेड़छाड़ की। सांसद जॉन ब्रिटास, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एमए बेबी और केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता पी. विजयन जब शांतिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह कर रहे थे, तब पुलिस ने उन्हें घसीटकर बंदी वाहन में ठूंस दिया। सांसद ब्रिटास की पुलिस ने पिटाई भी की। दिल्ली पुलिस का वही भूत अब मुंबई पुलिस के भीतर भी प्रवेश कर गया है। शिवाजी पार्क क्षेत्र में सत्याग्रह कर रहे बच्चों को बेरहमी से घसीटकर वाहनों में ठूंस दिया गया। इनमें बड़ी संख्या में छात्राएं भी शामिल हैं।"
शिवसेना (यूबीटी) ने सामना में कहा, "भारतरत्न, पद्मश्री, पद्मभूषण, ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले लोग सरकार के 'गुलाम' बन गए हैं। रंगमंच के महान कलाकार और अभिनेत्रियां बच्चों पर हो रहे अत्याचार को खुली आंखों से देखकर भी 'तानाशाही' का समर्थन कर रहे हैं। ये बुद्धिजीवी भारत की परिस्थितियों को अपनी आंखों से देख रहे हैं। इनमें से 90 प्रतिशत लोग सरकार की 'चापलूसी' करने में ही अपनी धन्यता मानते हैं।"
शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र में आगे लिखा गया, "पर्दे पर और नाटकों में नायक बड़े-बड़े जोशीले संवाद बोलते हैं, लेकिन जब देश संकट में होता है, तब वे अपने मुंह पर पट्टी बांधकर बैठ जाते हैं। 'लाड़ली बहना' योजना के लाभार्थियों की तरह ये बुद्धिजीवी भी सरकार से मिलने वाले लाभों के भागीदार हैं। इनमें से कुछ लोगों की आवाज अवश्य बुलंद है और वे निर्भीकता से अपनी राय रखते हैं। वे राष्ट्रभक्ति पर आधारित फिल्मों में अभिनय करते हैं, लेकिन सत्ताधारियों की 'मनमानी' और 'तानाशाही' शुरू होते ही यही लोग सरकार के गुणगान में लग जाते हैं। इसीलिए प्रकाश राज, नसीरुद्दीन शाह, इमरान खान और यहां तक कि जया बच्चन जैसे कलाकार अधिक राष्ट्रवादी सिद्ध होते हैं।"
'सामना' में लिखा गया, "पूर्व क्रिकेटर संजय मांजरेकर ने भी पुलिस के लाठीचार्ज के विरोध में निर्भीक रुख अपनाकर अपनी अंतरात्मा के जीवित होने का प्रमाण दिया है। जिन्हें हम और आप प्रसिद्ध हस्तियां मानते हैं, वे केकड़े की भुजाओं की तरह प्रभावहीन हो गए हैं। आज ये लोग सरकार के पक्ष में खड़े हैं। अर्थात वे मतों की चोरी और 'तानाशाही' का समर्थन कर रहे हैं। कल सत्ता बदलते ही वे राहुल गांधी के समर्थक या उद्धव ठाकरे के अनुयायी बन जाएंगे, ऐसी आशंका है। ऐसे अवसरवादियों को तब अपने आसपास भी भटकने न देना। अन्यथा आज संघर्ष कर रहे और पुलिस तथा सरकार के दमनचक्र का शिकार बने युवाओं के त्याग का अपमान होगा।"
'सामना' में आगे लिखा गया, "जो बुद्धिजीवी कायरतापूर्वक अत्याचार होते हुए देख रहे हैं, वे समाज के शत्रु हैं। देश और समाज के लिए उनका कोई उपयोग नहीं है। डरपोक और स्वार्थी लोगों का यह समूह किसी काम का नहीं है। देश में 'गृहयुद्ध' अर्थात अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। दिल्ली एक पुलिस थाने में बदल गई है। छोटे-छोटे बच्चों और बच्चियों को निर्लज्जतापूर्वक पीटा जा रहा है। हालांकि इस पर एक शब्द भी न बोलने वाले प्रधानमंत्री चेन्नई जाकर वहां 'मेट्रो' की प्रस्तुति देख रहे हैं और विकास पर भाषण दे रहे हैं।"
'सामना' में आगे लिखा गया, "भारतरत्न, पद्मश्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वालों, देश तुम्हारी लाचारी और कायरता को कभी नहीं भूलेगा! सबका हिसाब हो चुका है!"
--आईएएनएस
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