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Delhi High Court: 16 साल की रेप पीड़िता को 31 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की अनुमति, कोर्ट ने दिए 3 अहम निर्देश

 

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि एक नाबालिग से बच्चे को जन्म देने और उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। अदालत ने इस मामले को पीड़िता के सम्मान, अधिकारों और मानवीय गरिमा से जुड़ा बताया।

कोर्ट के अनुसार, यौन हिंसा की शिकार नाबालिग को गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके सम्मानजनक जीवन और मानसिक स्थिति पर गंभीर असर डाल सकता है। इस मामले में अदालत ने चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान पीड़िता की सुरक्षा और संभावित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कई निर्देश भी जारी किए।

कोर्ट ने दिए तीन अहम निर्देश

1. DNA जांच के लिए भ्रूण के टिश्यू सुरक्षित रखने का आदेश

पीड़िता पहले से ही लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती है। अदालत ने डॉक्टरों को निर्देश दिया कि गर्भसमापन की प्रक्रिया के दौरान भ्रूण के टिश्यू सुरक्षित रखे जाएं, ताकि जरूरत पड़ने पर आपराधिक मामले में DNA जांच के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सके।

2. जीवित जन्म होने पर बच्चे को तुरंत मिले चिकित्सा सहायता

अदालत ने निर्देश दिया कि गर्भसमापन की प्रक्रिया के दौरान यदि बच्चा जीवित पैदा होता है, तो अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट उसकी हर संभव चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करें।

कोर्ट ने उपचार का खर्च राज्य सरकार को उठाने का भी निर्देश दिया। इसका उद्देश्य ऐसी स्थिति में नवजात को तत्काल और आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है।

3. परिवार की इच्छा पर बच्चे को गोद देने का विकल्प

अदालत ने कहा कि यदि नाबालिग पीड़िता और उसका परिवार ऐसा चाहते हैं, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चे को गोद देने का विकल्प अपनाया जा सकता है। साथ ही, पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।

31 सप्ताह की गर्भावस्था में जीवित जन्म होने पर क्या होता है?

गर्भावस्था के 31वें सप्ताह तक भ्रूण का काफी विकास हो चुका होता है। ऐसी स्थिति में यदि गर्भसमापन की चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा होता है, तो उसके जीवित रहने की संभावना हो सकती है। हालांकि, उसकी स्थिति कई चिकित्सकीय कारकों पर निर्भर करती है और उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में विशेष देखभाल की जरूरत पड़ सकती है।

इसी संभावित स्थिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अस्पताल को पहले से आवश्यक चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जीवित जन्म होना निश्चित है, बल्कि यह संभावित परिस्थिति के लिए एहतियाती व्यवस्था है।

गर्भसमापन को लेकर कानून क्या कहता है?

भारत में गर्भसमापन से संबंधित कानून के तहत सामान्य परिस्थितियों में 20 सप्ताह तक गर्भपात के लिए एक पंजीकृत चिकित्सा विशेषज्ञ की राय आवश्यक होती है। निर्धारित विशेष श्रेणियों में 20 से 24 सप्ताह तक गर्भसमापन की अनुमति दी जा सकती है, जिनमें नियमों के अनुसार यौन हिंसा की पीड़िताएं भी शामिल हैं।

24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था के मामलों में कानूनी स्थिति अलग हो सकती है और परिस्थितियों के अनुसार अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। इसलिए 31 सप्ताह की गर्भावस्था से जुड़ा यह मामला विशेष कानूनी और चिकित्सकीय महत्व रखता है।

पीड़िता की गरिमा और अधिकारों पर कोर्ट का जोर

इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग पीड़िता की स्थिति, उसके अधिकारों और सम्मानजनक जीवन के महत्व पर जोर दिया। अदालत के निर्देशों में चिकित्सा सहायता, संभावित नवजात की देखभाल, DNA जांच के लिए साक्ष्य सुरक्षित रखने और पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है।