Delhi Air Pollution: दिल्ली की हवा में सिर्फ धूल-धुआं नहीं, पारे को लेकर भी बढ़ी चिंता; IITM की रिसर्च में सामने आई अहम जानकारी
नई दिल्ली और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण लंबे समय से बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बना हुआ है. आमतौर पर प्रदूषण की चर्चा में वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्य, धूल और सर्दियों में पराली जलाने को प्रमुख कारण माना जाता है. हालांकि, हवा में मौजूद प्रदूषकों की तस्वीर इससे कहीं ज्यादा व्यापक है.
पुणे स्थित Indian Institute of Tropical Meteorology (IITM) लंबे समय से दिल्ली की हवा में अलग-अलग प्रदूषकों और उनके स्रोतों का अध्ययन कर रहा है. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक IITM की एयर क्वालिटी रिसर्च में मर्करी यानी पारे की मॉनिटरिंग भी शामिल रही है.
दिल्ली की हवा में मर्करी क्यों महत्वपूर्ण है?
मर्करी यानी पारा एक ऐसा तत्व है जो पर्यावरण में मौजूद रहने के साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय माना जाता है. खासतौर पर लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने पर यह नर्वस सिस्टम और शरीर के दूसरे हिस्सों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है.
इसी वजह से वैज्ञानिकों के लिए हवा में मौजूद मर्करी की मात्रा और उसके स्रोतों की पहचान करना महत्वपूर्ण है. दिल्ली जैसे बड़े और घनी आबादी वाले शहर में इस तरह के प्रदूषकों की निगरानी और भी जरूरी हो जाती है.
IITM की रिसर्च में क्या सामने आया?
IITM और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों की ओर से दिल्ली-NCR की हवा को लेकर लगातार अध्ययन किए जा रहे हैं. फरवरी 2026 में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि IITM ने दिल्ली में PM2.5 के measurement-based source apportionment पर भी काम किया है. इसके तहत हवा में मौजूद प्रदूषण कणों की रासायनिक संरचना का विश्लेषण किया गया.
सरकार के अनुसार, दिल्ली-NCR के प्रदूषण स्रोतों को ज्यादा बारीकी से समझने के लिए IITM, IIT Delhi, TERI और ARAI सहित संस्थानों के साथ मिलकर वैज्ञानिक अध्ययन भी चल रहा है. इसका उद्देश्य अलग-अलग स्रोतों से होने वाले उत्सर्जन की पहचान करना है.
मर्करी कहां से हवा में पहुंचता है?
मर्करी के उत्सर्जन में कोयला जलाने वाली औद्योगिक इकाइयों और बिजली संयंत्रों की भूमिका हो सकती है. इसके अलावा कुछ औद्योगिक प्रक्रियाएं और कचरे का अनुचित दहन भी वातावरण में मर्करी पहुंचाने वाले स्रोत हो सकते हैं.
यही वजह है कि सिर्फ वाहनों के प्रदूषण को नियंत्रित करना दिल्ली की पूरी वायु गुणवत्ता समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता. अलग-अलग प्रदूषकों के लिए उनके स्रोत के हिसाब से नियंत्रण रणनीति जरूरी होती है.
सर्दियों में समस्या और बढ़ सकती है
दिल्ली में सर्दियों के दौरान हवा की गति कम होने और वातावरणीय परिस्थितियों के कारण प्रदूषकों के फैलाव की क्षमता घट सकती है. ऐसे समय में अलग-अलग स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक वातावरण में ज्यादा देर तक बने रह सकते हैं.
इसी कारण दिल्ली-NCR में सर्दियों के दौरान एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग और प्रदूषण नियंत्रण उपायों को विशेष महत्व दिया जाता है. IITM ने दिल्ली के लिए एयर क्वालिटी अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो गंभीर प्रदूषण की घटनाओं का पूर्वानुमान देने के लिए बनाया गया है.
सिर्फ AQI देखना क्यों काफी नहीं?
AQI आम लोगों को हवा की समग्र गुणवत्ता समझने में मदद करता है, लेकिन इसमें प्रदूषण के हर संभावित रासायनिक घटक की अलग-अलग तस्वीर हमेशा सामने नहीं आती. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए PM2.5 के साथ-साथ मर्करी, ब्लैक कार्बन और दूसरे प्रदूषकों की निगरानी भी जरूरी है.
सरकार ने भी दिल्ली-NCR में प्रदूषण स्रोतों की पहचान के लिए माप-आधारित और मॉडल-आधारित source apportionment को मजबूत करने की बात कही है.
क्या दिल्ली की हवा में 'नया जहर' घुल गया है?
मर्करी को लेकर चिंता जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे दिल्ली की हवा में अचानक पैदा हुआ कोई नया प्रदूषण तत्व बताना सही नहीं होगा. मर्करी की मॉनिटरिंग दिल्ली में पहले से की जाती रही है और IITM द्वारा विकसित SAFAR सिस्टम में भी मर्करी को ट्रैक करने की क्षमता शामिल की गई थी.
इसलिए मौजूदा रिसर्च का महत्व इस बात में है कि वैज्ञानिक दिल्ली की हवा में मौजूद प्रदूषकों और उनके स्रोतों को पहले से ज्यादा विस्तार से समझने की कोशिश कर रहे हैं. इससे भविष्य में प्रदूषण नियंत्रण के लिए ज्यादा लक्षित कदम उठाने में मदद मिल सकती है.
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बिल्कुल, इसे नए एंगल और अलग शब्दों में बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट की तरह तैयार किया है। आंकड़े आपके दिए गए स्रोत के अनुसार रखे गए हैं।