दक्षिण भारत के लिए बेहद खास पोंगल का पर्व, जानें दान-पुण्य का क्यों है अधिक महत्व?
नई दिल्ली, 12 जनवरी (आईएएनएस)। पूरे देश में 14 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा, जिसमें स्नान लेकर दान-पुण्य का अधिक महत्व माना जाता है। उत्तर भारत में उड़द की दाल और चावल का दान बेहद शुभ माना जाता है, लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में दान-पुण्य के साथ गोसेवा, विवाहित बेटियों और ब्राह्मणों को दान को विशेष महत्व दिया जाता है। आज हम आपको चार दिवसीय पोंगल पर दक्षिण भारत की दान परंपराओं से अवगत कराएंगे।
दक्षिण भारत में मकर संक्रांति पर दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मकर संक्रांति के दिन हरिदास का दान करने की परंपरा होती है। इस दिन भगवान विष्णु के भक्त यानी हरिदास सिर पर पीतल का पात्र रखकर मंदिर और आसपास के इलाकों में भ्रमण करते हैं और घर-घर जाकर चावल, फल, गुड़ और कपड़े दान करते हैं।
दान लेने वाला शख्स हरिदास के पैर छूकर आशीर्वाद लेता है। माना जाता है कि हरिदास को दान देने के लिए बुलाया नहीं जाता, बल्कि ये बिना बुलावे के हर घर में दान लेकर आते हैं। उन्हें भगवान विष्णु का रूप माना जाता है।
मट्टू पोंगल चार दिवसीय पोंगल का तीसरा दिन है। इस दिन गाय और बैलों की सेवा की जाती है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में तीसरे दिन गाय को सजाकर उसका पूजन किया जाता है और विशेष रूप से घर पर तैयार किया चावल और गुड़ का प्रसाद खिलाया जाता है। इसमें गाय के अलावा, बाकी पशु भी शामिल हैं।
कर्नाटक में मकर पोंगल पर विशेष रूप से तिल, गुड़, और नारियल के मिश्रण का दान किया जाता है और भगवान को चढ़ाया जाता है। इसे क्षेत्रीय भाषा में 'एल्लु-बेल्ला' कहा जाता है। माना जाता है कि इस दान से सारे पापों का नाश होता है और परिवार में प्यार और सुख-समृद्धि बढ़ती है।
दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में 'पुट्टिनिल्लू,' यानी मायके का उपहार और ब्राह्मणों के दान की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें विवाहित बेटियों को घर बुलाकर कपड़े, गहने और अनाज भेंट किए जाते हैं। माना जाता है कि विवाहित बेटियों को दान देने से घर में मां लक्ष्मी का वास होता है। वहीं ब्राह्मणों को सामर्थ्य अनुसार चावल, दाल, सब्जियां, घी और पैसे भेंट किए जाते हैं।
--आईएएनएस
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