दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी-विरोधी आंदोलन से दहशत, शहरों में कामकाज ठप
डरबन, 30 जून (आईएएनएस)। दक्षिण अफ्रीका में 'एंटी-इमिग्रेंट प्रोटेस्ट' के कारण आम लोग दहशत में हैं। मंगलवार को पूरे दक्षिण अफ्रीका में कामकाज ठप रहा, दुकानें बंद रहीं, बस के पहिए थमे रहे और पुलिस मुस्तैद दिखी। अवैध प्रवासियों को देश छोड़ने के लिए मंगलवार तक का समय दिया गया था। स्थानीय मीडिया ने बताया कि डेडलाइन के चलते शहर की सड़कों पर हलचल कम ही रही।
अंग्रेजी दैनिक 'मेल एंड गार्डियन' के अनुसार, “अवैध प्रवासियों” के खिलाफ मार्च के चलते लोगों को आशंका थी कि ये प्रदर्शन हिंसा में बदल सकते हैं। पिछले कुछ हफ्तों में मोजाम्बिक के दो, इथियोपिया के एक और मलावी के एक नागरिक की हत्या कर दी गई। बढ़ती हिंसा के बीच कुछ देश छोड़कर जा रहे हैं तो कुछ अफ्रीकी देशों ने निकासी के लिए बसों और प्लेन का इंतजाम कर दिया है।
मंगलवार को अफ्रीका के अन्य देशों से आए कई विदेशी नागरिकों ने काम पर जाने से परहेज किया। मुख्य व्यावसायिक शहर जोहान्सबर्ग और बंदरगाह शहर डरबन के कुछ हिस्सों में दर्जनों प्रदर्शनकारी, जिनमें कुछ लकड़ी की लाठियां लिए हुए थे, इकट्ठा हुए।
इस बीच, 'इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक जस्टिस' (आईईजे) ने सरकार से प्रवासियों के खिलाफ हिंसा और नफरत फैलाने वाले बयानों (हेट स्पीच) के मामले में तुरंत कदम उठाने की मांग की है। संस्था ने चेतावनी दी है कि राजनीतिक नेता और खुद कानून-व्यवस्था अपने हाथ में लेने वाले समूह (विजिलेंट ग्रुप), देश की गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को हल करने के बजाय संघर्ष कर रहे समुदायों की निराशा का फायदा उठा रहे हैं।
दक्षिण अफ्रीका के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक टाइम्स लाइव ने आईईजे के हवाले से कहा कि बेरोजगारी, गरीबी और खराब सार्वजनिक सेवाएं प्रवासन (माइग्रेशन) के कारण नहीं, बल्कि बरसों से चली आ रही आर्थिक और नीतिगत नाकामियों का नतीजा हैं। उन्होंने कहा, "इन अस्वीकार्य हालात को लेकर लोगों में जो गुस्सा है, वह समझ में आता है और इस पर ध्यान देने की जरूरत है।"
हालांकि, आईईजे ने साफ कहा कि वह "प्रवासियों के खिलाफ नफरत और खुद कानून-व्यवस्था अपने हाथ में लेने वाले समूहों की हिंसा के पूरी तरह खिलाफ है।"
रॉयटर्स के अनुसार, डरबन के केंद्र में “अवैध विदेशियों” के खिलाफ नारे लगाते लोगों का आरोप है कि घुसपैठियों के कारण उन्हें उनके देश में ही काम नहीं मिल रहा है, जो सही नहीं है।
प्रवासियों ने इस समय-सीमा को एक प्रत्यक्ष धमकी के रूप में देखा है। अप्रैल से अब तक हुई हिंसा में करीब पांच लोगों की हत्या हो चुकी है, जबकि हजारों लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं या उनकी दुकानें और संपत्तियां तोड़फोड़ का शिकार हुई हैं।
2008 से समय-समय पर दक्षिण अफ्रीका में ऐसे हमले होते रहे हैं। नतीजतन, कानूनी और अवैध प्रवासियों के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं किया जाता।
हाल फिलहाल “मार्च एंड मार्च” नामक समूह ने अभियान शुरू किया, जिसकी कमान पूर्व रेडियो प्रस्तोता ने संभाली। जब प्रोटेस्ट हिंसक हुआ और उनसे सवाल किया जाने लगा, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि “स्वतःस्फूर्त” घटनाओं के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
डरबन और जोहान्सबर्ग में मकान मालिकों द्वारा विदेशी किरायेदारों को अवैध रूप से निकाले जाने की घटनाएं भी सामने आईं, क्योंकि उन्हें डर था कि उनकी इमारतें तोड़फोड़ का शिकार हो सकती हैं।
देश के कई शहरों में होने वाले ये मार्च मुख्य रूप से गरीब और बेरोजगार दक्षिण अफ्रीकियों द्वारा किए जाने की उम्मीद है, जो प्रवासियों को अपनी समस्याओं का कारण मानते हैं।
हजारों पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं और सेना भी तैयार रखी गई है। रंगभेद (अपार्थाइड) के खत्म हुए 30 साल हो चुके हैं। इसके बाद भी दक्षिण अफ्रीका असमानता, धीमी आर्थिक वृद्धि और उच्च बेरोजगारी से जूझ रहा है। इसके बावजूद यह अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है और प्रवासियों को आकर्षित करता रहता है।
--आईएएनएस
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