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'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम व नियम' के खिलाफ वकीलों ने दायर की याचिका, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब

 

बिलासपुर, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की युगल पीठ के समक्ष गुरुवार को 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026' और 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता नियम 2026' की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई हुई। यह याचिका वीएन प्रसाद राव और अन्य की ओर से उनके अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी के माध्यम से दाखिल की गई है।

मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगल पीठ के समक्ष मामले की वर्चुअल सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर और अन्य ने पक्ष रखा।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष दलील दी कि यह नया अधिनियम नागरिकों के अंतःकरण की स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार और निजता से जुड़े मौलिक अधिकारों का सीधा हनन करता है। संविधान के तहत किसी भी व्यक्ति का धर्म उसकी व्यक्तिगत गरिमा और निजी जीवन का अभिन्न अंग है, जिसे सार्वजनिक मंचों या प्रशासनिक अनुमतियों के अधीन नहीं किया जा सकता।

'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026' और 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता नियम 2026' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी ने 200 दिन की लंबी प्रक्रिया, कड़ी सजा और निजता व धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघन पर चिंता जताई है।

अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से कहा कि हमने पूरे अधिनियम को नहीं, बल्कि 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026' और 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता नियम 2026' के कुछ प्रावधानों को अदालत में चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान किसी भी नागरिक के अधिकारों के खिलाफ हैं।

उन्होंने कहा कि अधिनियम के तहत यदि कोई नागरिक स्वेच्छा से भी धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे इसका सार्वजनिक प्रकाशन कराना होगा और कई प्रशासनिक विभागों व सरकारी अधिकारियों से स्वीकृतियां लेनी होंगी, जिसमें 200 से 300 दिनों का समय लगता है।

अधिवक्ता ने कहा कि नियमों की जटिलता के कारण स्वैच्छिक धर्मांतरण की स्थिति में भी धर्मांतरण करने वाले और कराने वाले दोनों को कई परिस्थितियों में उलझाकर आरोपी बनाए जाने का खतरा है। इसमें न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और 10 लाख रुपए तक के भारी अर्थदंड के कठोर प्रावधान शामिल हैं, जो बहुत ही खतरनाक है।

अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी ने यह भी कहा गया है कि अधिनियम के अस्पष्ट प्रावधानों की आड़ में प्रशासन की ओर से धार्मिक और पवित्र स्थलों को अवैध रूप से बंद कराया जा रहा है, जिससे आम नागरिक अपनी आस्था के अनुसार स्वतंत्र रूप से उपासना करने से वंचित हो रहे हैं।

नियमों का हवाला देकर जिन धार्मिक स्थलों को सरकार या पुलिस ने बंद किया है, हमने अदालत में अंतरिम राहत के तौर पर उन्हें खोलने का भी अनुरोध किया है। साथ ही, लोगों की सुरक्षा और सामाजिक बहिष्कार पर रोक लगाने की अपील की है।

अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी ने बताया कि मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगल पीठ ने अंतरिम राहत संबंधी आवेदन पर छत्तीसगढ़ सरकार को अपना पक्ष और जवाब दाखिल करने के लिए 3 सप्ताह का समय प्रदान किया है।

--आईएएनएस

डीसीएच/