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ब्रिक्स सहयोग और ग्लोबल साउथ के विश्वास का स्रोत

 

बीजिंग, 14 सितंबर (आईएएनएस)। 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को भारत के नई दिल्ली में आयोजित हुआ। इस साल ब्रिक्स सहयोग व्यवस्था की स्थापना की 20वीं वर्षगांठ है। वर्तमान शिखर सम्मेलन ने निष्पक्षता, न्याय और समावेशी विकास के लिए "ग्लोबल साउथ" की आकांक्षाओं को दिखाया। साथ ही, शिखर सम्मेलन ने इस बात की परीक्षा भी की कि बड़े नवोदित देश एकजुटता और सहयोग के जरिए उथल-पुथल भरी दुनिया में निश्चितता ला सकते हैं।

चार सदस्य देशों से लेकर अब तक ब्रिक्स में अब 11 औपचारिक सदस्य और 10 साझेदार देश शामिल हैं। ब्रिक्स का ढांचा ही बदलते समय को दर्शाता है। ब्रिक्स देशों में दुनिया की लगभग आधी आबादी रहती है, आर्थिक उत्पादन दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग 30 प्रतिशत है और व्यापार की कुल मात्रा दुनिया के कुल व्यापार का पांचवां हिस्सा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि वर्ष 2028 तक "ग्रेटर ब्रिक्स" की आर्थिक विकास दर जी7 की तुलना में तीन गुना हो जाएगी।

ब्रिक्स सहयोग में विश्वास ठोस नतीजों पर आधारित है। वर्ष 2026 में नई औद्योगिक क्रांति में साझेदारी पर ब्रिक्स फोरम के तहत 11 शहरों ने साझेदार शहरों का नेटवर्क बनाना शुरू किया। इससे सहयोग के दायरे को राष्ट्रीय स्तर से शहर के स्तर तक बढ़ाया गया। इस साल की पहली तिमाही तक नव विकास बैंक ने कुल 42.9 अरब डॉलर की 140 निवेश परियोजनाओं को मंजूरी दी है। नव विकास बैंक "ग्लोबल साउथ" के लिए महत्वपूर्ण वित्तपोषण साधन बन रहा है।

ब्रिक्स सहयोग में चीन और भारत अहम भूमिका निभाते हैं। इस साल और अगले साल भारत और चीन क्रमशः ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालेंगे। दोनों देशों के बीच बेहतर समन्वय "ग्रेटर ब्रिक्स" में सहयोग बढ़ाने के लिए लाभदायक है। सच तो यह है कि हाल के वर्षों में "ग्लोबल साउथ" के भू-राजनीतिक परिदृश्य में चीन-भारत संबंधों में सुधार सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक कारकों में से एक रहा है। दोनों देशों के नेताओं ने रणनीतिक सहमति कायम की कि चीन और भारत प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार हैं और एक-दूसरे के विकास के लिए खतरा नहीं, बल्कि अवसर हैं। इससे द्विपक्षीय संबंधों के स्वस्थ और सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण गारंटी प्रदान की गई।

वर्ष 2025 में चीन और भारत के बीच व्यापार 1 खरब 55 अरब 60 करोड़ डॉलर रहा। दोनों पक्षों ने पांच सीधी उड़ान फिर से शुरू कर दी और छह साल के बाद फिर से सीमा व्यापार बहाल किया। उधर, सुरक्षा के क्षेत्र में चीन-भारत सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक में आठ-सूत्री सहमति बनी। दोनों पक्षों ने सीमांत क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने को दोहराया, ताकि द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए बेहतर वातावरण तैयार हो सके।

वहीं, ग्लोबल साउथ के लिए एकजुटता और विकास का रास्ता बिना चुनौतियों के नहीं है। आंतरिक विकास का अंतर बढ़ रहा है, विदेशी तकनीक पर निर्भरता बनी हुई है और वैश्वीकरण-विरोधी सोच व एकपक्षवाद का असर भी मौजूद है। ब्रिक्स के विस्तार से समूह का प्रतिनिधित्व तो बढ़ा है, लेकिन आम सहमति तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया है। दरअसल, ब्रिक्स व्यवस्था की खासियत ठीक इसी बात में है कि सभी मुद्दों पर सदस्यों को एक साथ काम करने की जरूरत नहीं, बल्कि ब्रिक्स "रणनीतिक अलगाव के बिना रणनीतिक स्वायत्तता" हासिल करने के लिए एक प्लेटफॉर्म देता है। इस खुली और सहिष्णु विशेषता से यह संभव हो सकता है कि भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी रखता है और सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात पश्चिमी देशों के साथ गहरे आर्थिक संबंध रखते हैं।

ब्रिक्स मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को खत्म करना नहीं चाहता, बल्कि समानांतर तंत्र बनाने से नवोदित आर्थिक शक्तियों के लिए संस्थागत स्थान बढ़ाना चाहता है।

ब्रिक्स सहयोग और ग्लोबल साउथ के विकास में हमारा भरोसा मतभेदों से बचने से नहीं, बल्कि आम हितों की साफ समझ और व्यवहारिक सहयोग के विस्तार से आता है। चीन और भारत दो सबसे ज्यादा आबादी वाली उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सीमा मुद्दे, व्यापार और संबंध स्थिति में सुधार ही ग्लोबल साउथ की एकता का सबसे बड़ा सबूत है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

--आईएएनएस

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