BREAKING : दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद खत्म करने वाली भारतवंशी को मिला नोबेल शांति पुरस्कार! जानें नवनीतम पिल्लै की पूरी कहानी
नॉर्वे की नोबेल समिति ने 2026 के शांति पुरस्कार के लिए दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं भारतीय मूल की नवनीतम नवी पिल्लै के नाम की घोषणा की है। पिल्लै ने रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं और राजनीतिक कैदियों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम किया। उनके योगदान में युद्ध अपराधों, नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराधों के दोषियों को जवाबदेह ठहराने के प्रयास भी शामिल बताए गए हैं।भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मीं नवी पिल्लै ने वकालत से लेकर अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र तक कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं। आइए जानते हैं उनके जीवन और काम से जुड़ी पांच महत्वपूर्ण बातें।
नवी पिल्लै के 5 बड़े योगदान
1. रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाई
दक्षिण अफ्रीका में वकील के रूप में काम करते हुए नवी पिल्लै ने रंगभेद की नीति का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं का बचाव किया। उन्होंने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी काम किया। उनका कानूनी संघर्ष ऐसे समय में जारी रहा, जब दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ आंदोलन चल रहा था।
2. महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों के लिए काम
नवी पिल्लै महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को लेकर भी सक्रिय रहीं। उन्होंने 1985 में अंतरराष्ट्रीय संगठन इक्वैलिटी नाउ की सह-स्थापना की। यह संगठन लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है।
3. अंतरराष्ट्रीय अपराधों से जुड़े मामलों में भूमिका
पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह रवांडा में हुए नरसंहार से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीश रहीं। इसके अलावा, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) में भी न्यायाधीश के रूप में काम किया।
उनकी भूमिका अंतरराष्ट्रीय अपराधों के मामलों में न्याय और जवाबदेही को मजबूत करने के प्रयासों से जुड़ी रही है।
4. संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों की रक्षा
नवी पिल्लै ने 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे उठाए। उन्होंने मानवाधिकारों की रक्षा और उल्लंघन के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।
5. दक्षिण अफ्रीका में रचा इतिहास
नवी पिल्लै ने दक्षिण अफ्रीका की न्याय व्यवस्था में भी कई अहम उपलब्धियां हासिल कीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1967 में वह नटाल प्रांत में वकालत शुरू करने वाली पहली महिला बनीं। बाद में वह दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में न्यायाधीश बनने वाली पहली अश्वेत महिला भी बनीं।
रवांडा नरसंहार के मुकदमे में अहम भूमिका
नवी पिल्लै का नाम रवांडा नरसंहार से जुड़े एक ऐतिहासिक मुकदमे के कारण भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस मामले में यौन हिंसा और बलात्कार को नरसंहार के अपराध के रूप में समझने और कानूनी मान्यता देने की दिशा में अहम फैसला सामने आया था।
इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय कानून में यौन हिंसा के गंभीर अपराधों को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण को मजबूत करने में योगदान दिया।
नोबेल शांति पुरस्कार स्वीडन की बजाय नॉर्वे में क्यों दिया जाता है?
नोबेल पुरस्कारों में एक खास अंतर यह है कि भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और अर्थशास्त्र के पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं, जबकि शांति का नोबेल पुरस्कार नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में प्रदान किया जाता है।
इस व्यवस्था की शुरुआत अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत से हुई थी। उन्होंने 1895 में लिखी अपनी वसीयत में तय किया था कि शांति पुरस्कार का चयन नॉर्वे की संसद द्वारा नियुक्त समिति करेगी।
उस समय स्वीडन और नॉर्वे एक ही राजा के अधीन थे, हालांकि दोनों की अपनी संसद और अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं थीं। अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में यह स्पष्ट नहीं किया था कि उन्होंने शांति पुरस्कार की जिम्मेदारी नॉर्वे को ही क्यों सौंपी।
नोबेल का निधन 1896 में हुआ और 1901 से पुरस्कार दिए जाने शुरू हुए। वर्ष 1905 में स्वीडन और नॉर्वे अलग देश बन गए, लेकिन शांति पुरस्कार के चयन की जिम्मेदारी नॉर्वे के पास ही बनी रही।
इसी ऐतिहासिक व्यवस्था के कारण आज भी नोबेल शांति पुरस्कार नॉर्वे में दिया जाता है, जबकि अन्य प्रमुख नोबेल पुरस्कार स्वीडन में प्रदान किए जाते हैं।