बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी: शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार, लेकिन जनता की परेशानी और प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि भी जरूरी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन पुलिस की कार्रवाई पर रोक लगाने से पहले प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि और आम जनता को होने वाली असुविधा जैसे पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी है। अदालत की यह टिप्पणी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आई।
यह मामला मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क में 2 अक्टूबर को आयोजित ‘जेल भरो’ आंदोलन से जुड़ा है। प्रदर्शन के बाद मुंबई पुलिस ने आयोजकों और 400 से 500 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। पुलिस की इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए एडवोकेट सावर देवरे ने बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर अदालत ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है। हालांकि, किसी प्रदर्शन के संबंध में पुलिस की कार्रवाई पर रोक लगाने से पहले अदालत को संबंधित परिस्थितियों पर विचार करना होगा।
पीठ की टिप्पणी के अनुसार, प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि और प्रदर्शन के कारण आम लोगों को होने वाली परेशानी जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हैं। इस तरह अदालत ने प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े सवालों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया।
हालांकि, अदालत की टिप्पणी को प्रदर्शन करने के अधिकार पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मामला पुलिस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है और इसमें आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुआ था प्रदर्शन
कॉकरोच जनता पार्टी ने 2 अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर ‘जेल भरो’ आंदोलन किया था। इस प्रदर्शन के बाद मुंबई पुलिस ने आयोजकों और 400 से 500 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
इसके बाद एडवोकेट सावर देवरे ने पुलिस कार्रवाई को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दाखिल की। याचिका में पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इसी मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और जनता को होने वाली असुविधा से जुड़े पहलुओं पर टिप्पणी की।
पुलिस की कार्रवाई और कथित अवैध हिरासत का मामला भी उठा
सुनवाई के दौरान पीठ ने महाराष्ट्र सरकार को उन याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने का निर्देश भी दिया, जिनमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ मुंबई में हाल में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस पर लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लेने के आरोप लगाए गए हैं।
इन याचिकाओं में पुलिस की कार्रवाई और हिरासत की वैधता को लेकर सवाल उठाए गए हैं। अब महाराष्ट्र सरकार को अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा। इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक सुनवाई और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाएगा।
19 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
बॉम्बे हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को निर्धारित की गई है। अगली सुनवाई में मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं और महाराष्ट्र सरकार के जवाब पर आगे विचार किया जा सकता है।
इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के मौलिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे तय किया जाए। हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक मुद्दे की ओर ध्यान दिलाती है। फिलहाल, पुलिस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर अंतिम फैसला आना बाकी है।