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बोलपुर का सियासी गणित : वामपंथ का लाल रंग टीएमसी के हरे रंग में कैसे हुआ तब्दील?

 

कोलकाता, 15 मार्च (आईएएनएस)। जब हम पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की चर्चा करते हैं, तो मानस पटल पर यहां की लाल माटी, एकतारे की गूंज और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के 'शांतिनिकेतन' की दार्शनिक छवि खुद उभर आती है। किंतु वर्तमान में 41-बोलपुर (अनुसूचित जाति आरक्षित) लोकसभा क्षेत्र मात्र एक सांस्कृतिक केंद्र भर नहीं रह गया है। आज यह निर्वाचन क्षेत्र एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां एक ओर इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, तो दूसरी ओर आधुनिक रियल एस्टेट का बूम, कोयला खदानों से जुड़े विवाद और राजनीतिक सत्ता का भीषण संघर्ष है।

बोलपुर उन गिने-चुने संसदीय क्षेत्रों में हैं, जहां पुरुष और महिला दोनों की संख्या बिल्कुल बराबर (50-50 प्रतिशत) है। यह एक एससी आरक्षित सीट है, इसलिए यहां करीब 28.6 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति और लगभग 6.6 प्रतिशत आबादी आदिवासियों (संथाल, कोडा आदि) की है। साथ ही, लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी इस क्षेत्र को राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और ध्रुवीकृत बनाती है। राजनीतिक दलों के लिए यहां का समीकरण सुलझाना किसी जटिल गणित से कम नहीं है।

बोलपुर में लगभग 75 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं। लेकिन जैसे ही आप बोलपुर शहर या शांतिनिकेतन की तरफ बढ़ते हैं, नजारा एकदम बदल जाता है। कोलकाता के अमीर तबके के लिए यह 'वीकेंड होम' का सबसे पसंदीदा ठिकाना बन गया है। यहां करोड़ों रुपए के आलीशान विला और बुटीक अपार्टमेंट्स तेजी से उभरने लगे हैं।

2023 में शांतिनिकेतन को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला है, जो इस क्षेत्र के लिए गर्व की बात है। सरकार इस क्षेत्र की तस्वीर बदलने के लिए खड़गपुर-मोरग्राम के बीच 16,990 करोड़ रुपए का भव्य इकोनॉमिक कॉरिडोर बना रही है। साथ ही 'अमृत भारत योजना' के तहत बोलपुर स्टेशन का 21.1 करोड़ रुपए की लागत से कायाकल्प हो रहा है।

लेकिन विकास की इस कहानी में देउचा-पचामी कोयला खदान एक बड़ा ट्विस्ट है। यह दुनिया के सबसे बड़े कोयला ब्लॉक्स में से एक है। सरकार यहां लाखों रोजगार का सपना दिखा रही है, लेकिन आदिवासी समुदाय बड़े पैमाने पर विस्थापन और जंगलों की कटाई के डर से जल-जंगल-जमीन बचाने की निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है।

राजनीतिक तौर पर बोलपुर कभी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) का ऐसा अभेद्य किला था, जिसे भेदने की कल्पना भी मुश्किल थी। दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी ने यहां से लगातार सात बार जीत का परचम लहराया था।

लेकिन 2011 के विधानसभा चुनावों के बाद जैसे हवा का रुख ही बदल गया। वामपंथ का लाल रंग तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के हरे रंग में तब्दील हो गया। 2014 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी ने यहां वामपंथियों को भारी मतों से हराया। हालांकि, 2019 के आते-आते यहां सत्ता की जमीन फिर खिसकी और सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपना वोट शेयर 40 प्रतिशत के पार पहुंचा दिया और टीएमसी की जीत का अंतर मात्र एक लाख के करीब सिमट गया। 2024 के लोकभा चुनाव में इस लोकसभा सीट से टीएमसी के असित कुमार मल ने भाजपा के पिया साहा को हराया था। वहीं, तीसरे नंबर पर सीपीआई एम की उम्मीदवार श्यामाली प्रधान थी।

बोलपुर लोकसभा सीट का भौगोलिक विस्तार दो जिलों (बीरभूम और पूर्व बर्धमान) में फैला है। इसके अंतर्गत कुल 7 विधानसभा सीटें आती हैं। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की आंधी ने यहां विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था। वर्तमान में इन सभी 7 सीटों पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का एकतरफा कब्जा है।

केतुग्राम : यह एक अनारक्षित सीट है। यहां से टीएमसी के शेख शाहनवाज विधायक हैं, जिन्होंने ग्रामीण मुस्लिम और हिंदू वोटरों के मजबूत समीकरण के दम पर जीत दर्ज की।

मंगलकोट : इस अनारक्षित सीट से टीएमसी के अपूर्बा चौधरी वर्तमान विधायक हैं। यह क्षेत्र कृषि प्रधान है।

औसग्राम (एससी) : अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर टीएमसी के अभदानंद थंडेर ने जीत हासिल की, जहां दलित वोटरों ने निर्णायक भूमिका निभाई।

बोलपुर : लोकसभा का केंद्र और अनारक्षित सीट। यहां से टीएमसी के कद्दावर नेता और ममता सरकार में मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा विधायक हैं। विश्वविख्यात शांतिनिकेतन और शहरी विकास के प्रमुख केंद्र इसी क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

नानूर - (एससी) : एक समय वामपंथियों और तृणमूल के बीच खूनी संघर्ष के लिए कुख्यात इस आरक्षित सीट पर अब टीएमसी के बिधान चंद्र माझी का कब्जा है।

लाबपुर : इस अनारक्षित सीट से टीएमसी के अभिजीत सिन्हा विधायक हैं। यह क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक विरासत (तारापीठ के निकटता) के लिए जाना जाता है।

मयूरेश्वर : इस अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस के अभिजीत रॉय कर रहे हैं।

बोलपुर संसदीय क्षेत्र इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या तेजी से होता शहरीकरण और बड़े उद्योग, टैगोर की प्रकृति-प्रेमी विचारधारा के साथ सह-अस्तित्व बना सकते हैं?

--आईएएनएस

वीकेयू/एएस