बिहार : दर्द से बेपरवाह बाबा की भक्ति में लीन सुबोध, घुटनों के बल तय कर रहे बाबाधाम का सफर
मुंगेर, 11 अगस्त (आईएएनएस)। बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु अलग-अलग तरीके से आस्था का सफर तय करते हैं। कोई पैदल कांवड़ लेकर पहुंचता है तो कोई दंडवत यात्रा करता है। लेकिन लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह की बाबाधाम यात्रा आस्था, संकल्प और हौसले की ऐसी कहानी है, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है।
सुबोध ने घुटनों के बल चलकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार पहुंचने का संकल्प लिया है। वे प्रतिदिन एक से डेढ़ किलोमीटर की यात्रा कर पा रहे हैं। वे 18 किलोमीटर की यात्रा कर चुके है, इस दौरान उनके दोनों घुटनों की खाल तक निकल गई, गहरे जख्म हो गए और दर्द भी बढ़ता गया, लेकिन बाबा के दरबार तक पहुंचने की उनकी ललक कम नहीं हुई।
लखीसराय निवासी सुबोध कुमार सिंह 28 जुलाई को सुल्तानगंज से गंगाजल उठाकर अपने बेटे और एक दोस्त के साथ बाबाधाम की यात्रा पर निकले। खास बात यह है कि उन्होंने पैदल चलने के बजाय घुटनों के बल चलकर देवघर पहुंचने का संकल्प लिया है। उनके लिए यह यात्रा किसी मनोकामना की पूर्ति नहीं, बल्कि बाबा बैद्यनाथ के प्रति अपनी आस्था और विश्वास को समर्पित एक अलग तरह की साधना है।
सुबोध बताते हैं, "इससे पहले वह अपने गुरु के साथ 9 बार दंडवत यात्रा करते हुए बाबाधाम जा चुके हैं। वर्ष 2009 में उन्होंने अपने गुरु श्री श्री 108 दयाराम दास जी महाराज के साथ दंड यात्रा शुरू की थी। बीच में कुछ वर्षों तक यात्रा छूटी भी, लेकिन अब तक करीब 9 बार वह दंडवत यात्रा कर चुके हैं। इस बार उनके मन में कुछ अलग करने का विचार आया और उन्होंने घुटनों के बल बाबाधाम जाने का निर्णय लिया।"
सुबोध के इस फैसले से उनके परिवार वाले भी नाराज हुए। उन्होंने बताया कि घरवालों ने इस यात्रा का विरोध किया, लेकिन उनका मन नहीं माना। इसके बाद उन्होंने अपने बेटे और दोस्त को साथ लिया और सुल्तानगंज से निकल पड़े। यात्रा के शुरुआती दो दिनों में उन्होंने पांच से छह किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर ली। इसके बाद लगातार जमीन पर घुटनों के बल चलने के कारण दोनों घुटने बुरी तरह छिल गए। जख्म गहरे होते गए और दर्द भी बढ़ता गया। इसके बावजूद सुबोध ने यात्रा रोकने से इनकार कर दिया।
वह कहते हैं कि उन्हें खुद नहीं पता कि बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक पहुंचने में कितना समय लगेगा। सामान्य परिस्थितियों में 15 किलोमीटर की दूरी कुछ घंटों में पूरी की जा सकती है, लेकिन घुटनों के बल चलकर इतनी दूरी तय करना उनके लिए हर कदम पर परीक्षा जैसा है। फिर भी उनका कहना है कि मंजिल कितनी भी दूर हो, संकल्प बाबा के दरबार तक पहुंचने का है और यात्रा तब तक जारी रहेगी, जब तक बाबा के चरणों तक नहीं पहुंच जाते।
सुबोध इसे ‘हठ योग’ बताते हैं। उनका कहना है कि इसके पीछे कोई खास मनोकामना नहीं है। उन्होंने कहा कि महादेव अंतर्यामी हैं और उनसे कुछ छिपा नहीं है। जिस तरह कोई धार्मिक कार्य करने का विचार पहले मन में आता है, उसी तरह इस बार उनके मन में घुटनों के बल बाबा के दरबार जाने की प्रेरणा आई।
सुबोध को भरोसा है कि जिस तरह पहले दंडवत यात्राओं में बाबा ने उन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचाया, उसी तरह इस बार भी बाबा बैद्यनाथ उनका रास्ता आसान करेंगे। घुटनों के गहरे जख्म के बावजूद उनके चेहरे पर विश्वास और आंखों में मंजिल तक पहुंचने का संकल्प साफ नजर आता है। उनके लिए यह यात्रा सिर्फ दूरी तय करने का नाम नहीं, बल्कि आस्था की उस शक्ति का प्रतीक है, जो दर्द और मुश्किलों के बीच भी इंसान को आगे बढ़ने का हौसला देती है।
--आईएएनएस
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