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बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर में ब्लूबेरी खेती पर रिसर्च शुरू, किसानों की आय बढ़ाने की नई उम्मीद

 

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर ने एक नई और महत्वपूर्ण कृषि पहल की शुरुआत की है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अब ब्लूबेरी की खेती पर विस्तृत शोध कार्य शुरू किया है, जिसका उद्देश्य इस विदेशी फल को भारत की गर्म और उपोष्ण जलवायु में सफलतापूर्वक उगाने की संभावनाओं को तलाशना है।

ब्लूबेरी को दुनिया के सबसे पौष्टिक फलों में से एक माना जाता है, जिसकी बाजार में काफी अधिक मांग है। अब तक इसकी खेती मुख्य रूप से ठंडे देशों जैसे अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कुछ हिस्सों में ही सीमित थी। लेकिन बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर का यह शोध इस दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है कि क्या भारत के किसान भी इस उच्च मूल्य वाली फसल का लाभ उठा सकते हैं।

विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्लूबेरी की खेती भारतीय जलवायु के अनुसार सफल हो जाती है, तो यह किसानों के लिए आय के नए और बेहतर अवसर खोल सकती है। खासकर बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह फसल किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

शोध कार्य के तहत वैज्ञानिक विभिन्न प्रजातियों की ब्लूबेरी पर परीक्षण कर रहे हैं। इसके लिए मिट्टी की गुणवत्ता, तापमान नियंत्रण, सिंचाई प्रणाली और पौधों की वृद्धि दर जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। प्रारंभिक चरण में यह देखा जा रहा है कि क्या गर्म जलवायु में विशेष तकनीकों के उपयोग से ब्लूबेरी की उपज संभव हो सकती है या नहीं।

Bihar Agricultural University Sabour के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना और किसानों को पारंपरिक खेती से आगे बढ़ाकर उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की ओर प्रेरित करना है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो बिहार देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो सकता है जहां ब्लूबेरी जैसी अंतरराष्ट्रीय फसल की खेती संभव होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्लूबेरी की खेती के लिए विशेष प्रकार की अम्लीय मिट्टी और नियंत्रित जलवायु की आवश्यकता होती है। हालांकि, आधुनिक कृषि तकनीकों जैसे ग्रीनहाउस खेती, ड्रिप सिंचाई और मिट्टी संशोधन तकनीक की मदद से इसे गर्म क्षेत्रों में भी संभव बनाया जा सकता है।

कृषि विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ब्लूबेरी की बाजार कीमत अधिक होने के कारण इसकी खेती किसानों के लिए अत्यधिक लाभकारी साबित हो सकती है। इससे न केवल किसानों की आमदनी बढ़ेगी बल्कि कृषि निर्यात के नए अवसर भी खुल सकते हैं।

स्थानीय किसानों में भी इस पहल को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। कई किसान इस परियोजना को भविष्य की खेती के रूप में देख रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले वर्षों में उन्हें नई फसलों के माध्यम से बेहतर मुनाफा मिलेगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया कि शुरुआती शोध के परिणाम सकारात्मक रहे तो आगे बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल किए जाएंगे और किसानों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से जागरूकता कार्यक्रम चलाने की योजना भी बनाई जा रही है।

कुल मिलाकर, बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की यह पहल राज्य की कृषि व्यवस्था में एक नई क्रांति की शुरुआत मानी जा रही है, जो आने वाले समय में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।