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भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां जीवंत परंपराएं हैं, अतीत के अवशेष नहीं: उपराष्ट्रपति

 

चेन्नई, 3 जनवरी (आईएएनएस)। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शनिवार को चेन्नई के कलाइवनार अरंगम में 9वें सिद्ध दिवस समारोह का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने समकालीन विश्व में एक व्यापक, निवारक और टिकाऊ स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में सिद्ध चिकित्सा के महत्व पर बल दिया। नीति निर्माताओं, चिकित्सकों, शिक्षाविदों और छात्रों की एक विशिष्ट सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने सिद्ध चिकित्सा के सुदृढ़ दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक गहराई और शरीर, मन और प्रकृति के समग्र एकीकरण पर प्रकाश डाला।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि सिद्ध, आयुर्वेद, योग और अन्य आयुष पद्धतियों सहित भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां अतीत की वस्तुएं नहीं बल्कि जीवंत परंपराएं हैं जो भारत और विश्व भर में लाखों लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। उन्होंने कहा कि सिद्ध चिकित्सा देश की सबसे प्राचीन और गहन चिकित्सा परंपराओं में से एक है, जो हजारों वर्षों से संचित ज्ञान पर आधारित है। उन्होंने इसके समग्र दृष्टिकोण पर जोर दिया जो शरीर, मन और प्राकृतिक वातावरण के बीच सामंजस्य को बढ़ावा देता है।

प्राचीन ताड़ के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियों, शास्त्रीय ग्रंथों और औषधीय जड़ी-बूटियों पर प्रदर्शनी और प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत के संरक्षण और पुनर्खोज में विद्वानों और संस्थानों के असाधारण प्रयासों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक उपेक्षा और अपर्याप्त दस्तावेजीकरण के कारण, कई अमूल्य ग्रंथ लुप्त होने या खो जाने के खतरे में हैं, और भावी पीढ़ियों के लिए इस ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए व्यवस्थित संग्रह, संरक्षण और अनुसंधान में निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

उपराष्ट्रपति ने सिद्ध चिकित्सा के निवारक उपचार, जीवनशैली प्रबंधन और रोगों के मूल कारण का निवारण करने पर जोर देते हुए आज की तनावपूर्ण और अस्वस्थ आदतों से भरी तेज रफ्तार जीवनशैली में इसकी बढ़ती प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सिद्ध जैसी पारंपरिक प्रणालियां दीर्घकालिक उपचार और संतुलन बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, और चिकित्सकों से उत्तरदायित्वपूर्ण और साक्ष्य-आधारित अभ्यास के माध्यम से जनता का विश्वास मजबूत करने का आह्वान किया।

उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि सिद्ध चिकित्सा में निरंतर शोध से महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियां प्राप्त हो सकती हैं, जिनमें वर्तमान में असाध्य रोगों का स्थायी इलाज भी शामिल है। उन्होंने शोधार्थियों को उन्नत अध्ययन जारी रखने के लिए हर संभव वित्तीय सहायता प्रदान करने का आग्रह किया और आशा व्यक्त की कि शोधकर्ताओं की भावी पीढ़ियां भारत की पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान प्रणालियों को वैश्विक मान्यता दिलाएंगी।

उद्घाटन समारोह में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव, तमिलनाडु सरकार के स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण मंत्री मा. सुब्रमणियन, आयुष मंत्रालय और तमिलनाडु सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, और सिद्ध संस्थानों के प्रमुख उपस्थित थे।

सभा को संबोधित करते हुए प्रतापराव जाधव ने कहा कि सिद्ध चिकित्सा में स्वास्थ्य, प्रकृति और चेतना की उन्नत समझ समाहित है, जो इसे आधुनिक समग्र स्वास्थ्य देखभाल के लिए अत्यंत प्रासंगिक बनाती है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में, विशेष रूप से 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना के बाद, अभूतपूर्व विकास हुआ है।

उन्होंने सिद्ध शिक्षा और अनुसंधान में हासिल की गई प्रमुख उपलब्धियों पर जोर दिया, जिनमें राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान में बुनियादी ढांचे का विस्तार, कौशल-उन्मुख और प्रौद्योगिकी-आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम और सिद्ध अनुसंधान के लिए केंद्रीय परिषद द्वारा किए गए मजबूत शोध कार्य शामिल हैं। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ आईसीडी-11 में सिद्ध रुग्णता कोडों को शामिल करने और आगामी डब्ल्यूएचओ अंतरराष्ट्रीय मानक शब्दावलियों से सिद्ध चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य सेवा मानचित्र पर मजबूती से स्थान मिलेगा।

--आईएएनएस

एमएस/डीएससी