'भारत के बच्चों के साथ छल कर रहीं सोशल मीडिया कंपनियां', यौन शोषण मामलों पर बोले प्रियंक कानूनगो
नई दिल्ली, 15 अक्टूबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा है कि बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री से जुड़े मामलों से संबंधि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अभी भी पालन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियां भारत के बच्चों के साथ छल कर रही हैं और देश के सामने झूठ बोल रही हैं।
समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में प्रियंक कानूनगो ने कहा, "भारत में पॉक्सो जैसा सख्त कानून है, जो बच्चों को यौन अपराधों से बात करता है। इस कानून की धारा 19 में स्पष्ट है कि बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों की सूचना स्थानीय पुलिस थाने को देनी होगा और धारा 20 के अनुसार यह नियम सोशल मीडिया कंपनियों पर लागू होता है। पॉक्सो एक्ट का नियम 11 भी स्पष्ट करता है कि स्थानीय पुलिस थाने को हर अपराध की जानकारी देनी होगी, जहां बच्चे के साथ यौन शोषण हुआ है।"
कानूनगो ने कहा, "सोशल मीडिया कंपनियां इससे बचने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाती हैं। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि 'स्थानीय पुलिस थाने को सूचित करने का नियम कानून का ही प्रावधान है। इससे कोई भी नहीं बच सकता है और कंपनियों को इसका पालन करना होगा'। लेकिन अभी भी इसके पालन का इंतजार है।"
उन्होंने कहा, "लाखों बच्चों का यौन शोषण हो रहा है। उनके वीडियो बनाए जा रहे हैं। हमने देखा है कि किस तरह इंस्टाग्राम और फेसबुक पर यह वीडियो बेचे जा रहे थे। उन पर विज्ञापन लगातार मेटा कंपनी पैसे कमा रही थी। पुलिस को रिपोर्ट न करने की बजाय अपने एनजीओ और महंगे वकीलों के माध्यम से कोर्ट में दांव पेंच किया जा रहा है। बच्चों के साथ धोखा किया जा रहा है और यह देश को जानना चाहिए।"
प्रियंक कानूनगो ने कहा, "सोशल मीडिया कंपनियां महंगे वकील करके और एनजीओ को विदेश से फंडिंग कराकर देश के बच्चों के साथ छल कर रही हैं और उनका शोषण किया जा रहा है।"
एनएचआरसी सदस्य ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून के प्रावधान में जेल की सजा है, लेकिन दुर्भाग्य है कि देश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो बच्चों के खिलाफ और कंपनियों के हित में काम कर रहे हैं।
इससे पहले, प्रियंक कानूनगो ने गुरुवार सुबह 'एक्स' पोस्ट में लिखा, "सर्वोच्च न्यायालय का आदेश 2024 में पारित हुआ था, लेकिन अभी भी इसका पालन नहीं किया गया है। आज इस मामले पर फिर से सुनवाई हो रही है। भारत का पॉक्सो कानून स्पष्ट है कि बच्चों के यौन शोषण की शिकायतों की सूचना स्थानीय पुलिस को दी जानी चाहिए। फिर भी, सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार दिए गए निर्देशों के बावजूद सोशल मीडिया कंपनियां इस कानून का पालन करने से बच रही हैं।"
कानूनगो ने लिखा, "कई वर्षों से यह मामला फंसा हुआ, जबकि लाखों बच्चे न्याय मिलने का इंतजार कर रहे हैं। महंगे वकील और विदेशी फंडिंग से चलने वाले एनजीओ, सर्वोच्च न्यायालय में इन कंपनियों का बचाव कर रहे हैं। लेकिन भारत के मासूम बच्चों की तरफ से कौन बोलेगा? वे खुद अदालत नहीं जा सकते और न ही महंगे वकीलों का खर्च उठा सकते हैं। हम सभी जानते हैं कि मेटा विज्ञापनों के जरिए अपने कंटेंट से कमाई करता है। जब इन प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री फैलती है, तो उससे मिलने वाले ट्रैफिक और विज्ञापन से होने वाली कमाई का फायदा किसे मिलता है?"
उन्होंने सवाल करते हुए कहा, "ये कंपनियां बच्चों के यौन शोषण की घटनाओं की सूचना स्थानीय पुलिस को देने से क्यों कतरा रही हैं? जब बच्चे लगातार पीड़ित हो रहे हैं, तो एक स्पष्ट कानूनी आदेश को लागू करने में अभी भी देरी क्यों हो रही है?"
--आईएएनएस
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